सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या पर पितरों के तर्पण और दीपदान का है विशेष महत्व

आश्विन कृष्ण अमावस्या की शाम समस्त पितृगणों की वापसी उनके गंतव्य की ओर होने लगती है। माना जाता है कि पितृगण सूर्य-चन्द्रमा की रश्मियों के सहारे वापिस अपने लोक जाते हैं, ऐसे में उनके वंशजों द्वारा प्रज्जवलित दीपों की रोशनी से पितरों को वापसी का मार्ग दिखाई देता है और वह आशीर्वाद के रूप में घर-परिवार में सुख-शांति प्रदान करते हैं, जिससे भाग्य में आने वाली बाधाऐं दूर होती हैं।

धर्म डेस्क,नई दिल्ली। सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या पितरों के स्मरण, तर्पण और श्रद्धापूर्वक विदाई का विशेष दिन माना जाता है। जिन पूर्वजों अथवा माता-पिता का देहावसान अमावस्या के दिन हुआ हो या किसी व्यक्ति को अपने दिवंगत परिजन की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, उनका श्राद्ध सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के दिन करने की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितरों को संतुष्टि प्राप्त होती है और उनका आशीर्वाद परिवार को मिलता है।
पितृ विसर्जनी अमावस्या के दिन शाम के समय पितरों को भोग अर्पित करने के बाद घर की दहलीज पर दीपक जलाकर पितरों से क्षमा और आशीर्वाद की प्रार्थना करने की परंपरा है। इस अवसर पर श्रद्धालु प्रार्थना करते हैं—‘‘हे पितृदेव! जाने-अनजाने में हुई भूल-चूक को क्षमा करें और हमें आशीर्वाद दें कि हम अपने जीवन को सुख-शांति और सद्भाव के साथ व्यतीत कर सकें।’’
श्राद्ध प्रकाश और यम स्मृति में कहा गया है—‘‘आयुः प्रजां धनं विद्यां, स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पिताः।।’’ अर्थात श्रद्धापूर्वक तर्पण से प्रसन्न हुए पितर आयु, संतान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और समृद्धि प्रदान करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितरों की प्रसन्नता से परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य का मार्ग प्रशस्त होता है।
पितृ विसर्जनी अमावस्या के दिन मध्यान्ह काल में स्नान कर सभी पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने का विधान बताया गया है। इस अवसर पर पितरों के निमित्त ब्राह्मण भोजन कराने की भी परंपरा है। मान्यता के अनुसार पिता, पितामह, प्रपितामह, माता तथा अन्य दिवंगत पूर्वजों का तर्पण किया जाता है। इसके साथ ही पितृवंश, मातृवंश, गुरुवंश, श्वसुर वंश और मित्रवंश से जुड़े दिवंगत लोगों के निमित्त भी इस दिन श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगा सहित अन्य पवित्र नदियों के तट पर गोधूलि बेला में पितरों के निमित्त दीपदान करना विशेष फलदायी माना गया है। जिन स्थानों पर नदी उपलब्ध न हो, वहां पीपल के वृक्ष के नीचे दीप प्रज्वलित करने की परंपरा है। दक्षिण दिशा की ओर दीपकों की लौ रखते हुए सोलह दीपक जलाने का विधान बताया गया है। दीपकों के पास पूरी, मिठाई, चावल और दक्षिणा आदि अर्पित कर दोनों हाथ ऊपर उठाकर दक्षिण दिशा की ओर पितरों को श्रद्धापूर्वक विदाई दी जाती है।
इस अवसर पर श्वेत पुष्प अर्पित करते हुए पितरों को अगले वर्ष तक के लिए विदा करने की धार्मिक परंपरा है। मान्यता है कि पितृ विसर्जन के साथ पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और सम्मान की भावना व्यक्त की जाती है। शास्त्रों में कहा गया है—‘‘पितरं प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः’’ अर्थात पितरों के प्रसन्न होने पर सभी देवता प्रसन्न होते हैं। धार्मिक विश्वास है कि पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होने पर जप, तप, पूजा-पाठ, अनुष्ठान और साधना सफल होते हैं तथा परिवार में सुख-शांति और मंगल की कामना पूर्ण होती है।

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