नासिक का आदिवासी गांव बना महाराष्ट्र का पहला इंटरनेशनल ‘डार्क स्काई प्लेस

नासिक के सुरगाणा तालुका का एक दूर-दराज आदिवासी गांव, लाइट पॉल्यूशन (रोशनी से होने वाले प्रदूषण) को छोड़कर तारों की रोशनी को अपनाने को तैयार है। जिला प्रशासन उदमल को महाराष्ट्र की पहली 'डार्क स्काई कम्युनिटी' और भविष्य में एस्ट्रो-टूरिज़्म का केंद्र बना रही है।

नासिक/महाराष्ट्र। शहरों की चकाचौंध से दूर महाराष्ट्र के नासिक जिले के सुरगाणा तालुका स्थित आदिवासी बहुल उदमल गांव में अब रात का प्राकृतिक अंधेरा विकास का माध्यम बनने जा रहा है। गांव के 22 वर्षीय भौतिकी छात्र विपुल खिराड़ी ने अपने गांव को महाराष्ट्र की पहली ‘डार्क स्काई कम्युनिटी’ बनाने का सपना देखा है। इस पहल का उद्देश्य प्रकाश प्रदूषण को नियंत्रित कर प्राकृतिक रात्रि आकाश को संरक्षित करना और खगोल विज्ञान, शिक्षा तथा पर्यटन को बढ़ावा देना है।
विपुल के इस सपने की शुरुआत वर्ष 2019 में हुई, जब वह सताना स्थित एकलव्य अंग्रेजी माध्यम आवासीय विद्यालय में आठवीं कक्षा के 14 वर्षीय छात्र थे। उस दौरान उन्होंने पुणे की संस्था एस्ट्रोनएरा की ओर से आयोजित तारों के अवलोकन कार्यक्रम में हिस्सा लिया। रात के साफ आसमान में तारों को देखने के अनुभव ने उनमें खगोल विज्ञान के प्रति गहरी रुचि पैदा कर दी। इसके बाद उन्होंने एस्ट्रोनएरा के साथ स्वयंसेवक के रूप में काम किया और देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित खगोल विज्ञान कार्यक्रमों में भाग लिया।
इन्हीं अनुभवों के दौरान विपुल को महसूस हुआ कि उनके गांव की सबसे बड़ी विशेषता उसका प्राकृतिक अंधेरा आसमान है। सुरगाणा की पहाड़ियों के बीच स्थित उदमल शहरों की रोशनी से काफी दूर है, जिसके कारण यहां रात में आसमान अपेक्षाकृत साफ और तारों से भरा दिखाई देता है। मनाली की एक यात्रा के दौरान उनके मन में विचार आया कि उनका गांव भी दुनिया के उन स्थानों में शामिल हो सकता है जहां प्राकृतिक अंधेरे आसमान को संरक्षित किया जाता है।
विपुल ने इस विचार को गांव तक पहुंचाने के लिए घर-घर जाकर लोगों से बातचीत की। शुरुआत में ग्रामीणों को आशंका थी कि ‘डार्क स्काई’ परियोजना के नाम पर रात में रोशनी के इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाई जाएंगी और इससे रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होगी। विपुल ने उन्हें समझाया कि इसका उद्देश्य गांव को अंधेरे में रखना नहीं, बल्कि ऐसी स्मार्ट प्रकाश व्यवस्था अपनाना है जिससे आवश्यक रोशनी भी उपलब्ध रहे और आसमान में अनावश्यक प्रकाश का फैलाव भी कम हो।
धीरे-धीरे ग्रामीणों ने इस पहल का समर्थन करना शुरू किया। इसके बाद एस्ट्रोनएरा ने स्थानीय लोगों और प्रशासन के साथ मिलकर परियोजना को आगे बढ़ाने पर काम शुरू किया। इस पहल को अब समुदाय की भागीदारी से आगे बढ़ाया जा रहा है। संस्था की निदेशक श्वेता कुलकर्णी के अनुसार, यह ऐसा विकास मॉडल है जिसे बाहर से गांव पर थोपा नहीं जा रहा, बल्कि स्थानीय लोग स्वयं इसकी दिशा तय कर रहे हैं।
डार्क स्काई पहल के माध्यम से उदमल में खगोल पर्यटन को बढ़ावा देने की भी योजना है। गांव में आने वाले पर्यटकों और खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों के लिए आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएंगी। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। साथ ही गांव की प्राकृतिक परिस्थितियों, संस्कृति और पर्यावरण के संरक्षण पर भी जोर दिया जाएगा।
नासिक जिला प्रशासन ने ‘डार्क स्काई इंटरनेशनल’ के मानकों के तहत प्रमाणन की दिशा में आवश्यक बुनियादी ढांचे और उपकरणों के लिए धन स्वीकृत किया है। परियोजना के तहत गांव में दूरबीन, आकाश की गुणवत्ता मापने वाले उपकरण और अन्य आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे। पर्यटकों तथा खगोल विज्ञान के प्रति उत्साही लोगों के लिए सुविधाओं के विकास की भी योजना है।
नासिक के जिलाधिकारी आयुष प्रसाद ने बताया कि जिला योजना समिति के माध्यम से इस परियोजना के लिए 42 लाख रुपये की राशि उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया है। प्रशासन का मानना है कि उदमल की पहल भविष्य में महाराष्ट्र के अन्य क्षेत्रों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है और ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे सामुदायिक पर्यटन मॉडल को बढ़ावा मिल सकता है।
उदमल महाराष्ट्र सरकार की ओर से ‘इंटरनेशनल डार्क स्काई प्लेस’ का दर्जा दिलाने के लिए चुने गए 11 स्थानों में शामिल है। इस सूची में कास पठार, लोनार और तोरणमाल जैसे प्रमुख स्थान भी शामिल हैं। ऐसे में उदमल के लिए यह पहल न केवल पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि गांव की पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का अवसर भी है।
विपुल खिराड़ी के लिए यह परियोजना केवल खगोल पर्यटन को बढ़ावा देने तक सीमित नहीं है। उनका मानना है कि गांवों के युवाओं को बेहतर भविष्य के लिए अनिवार्य रूप से शहरों की ओर पलायन करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। यदि उदमल अपने प्राकृतिक अंधेरे आसमान को संरक्षित करते हुए पर्यटन और शिक्षा का केंद्र बनता है, तो यहां का अंधेरा ही गांव के लिए रोजगार, पहचान और विकास की नई रोशनी बन सकता है।

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