सांपों को मारने के लिए 129 साल पहले छोड़ी गई थी लाफिंग कूकाबुरा बर्ड, बन गई स्थानीय प्रजातियों के लिए खतरा

करीब 129 साल पहले 1897 में वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया ने सांपों को कंट्रोल करने के लिए सैकड़ों ईस्टर्न कूकाबुरा पक्षियों को छोड़ना शुरू किया। इससे ये दक्षिण-पश्चिम इलाके में फैल गए और वहां के स्थानीय पक्षियों, छिपकलियों और मेंढकों का शिकार करने लगे।

मेलबर्न/एजेंसी। लाफिंग कूकाबुरा ऑस्ट्रेलिया के सबसे पहचाने जाने वाले पक्षियों में से एक है, जो अपनी इंसानों जैसी तेज हंसी की आवाज और सांपों के शिकार के लिए जाना जाता है। हालांकि, वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में इस पक्षी की मौजूदगी एक सोचे-समझे प्रयोग का परिणाम है, जिसके दूरगामी पर्यावरणीय प्रभाव सामने आए हैं।
जानकारी के अनुसार, 19वीं सदी के अंत में, वर्ष 1897 में पूर्वी ऑस्ट्रेलिया से कूकाबुरा पक्षियों को वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में सांपों की संख्या नियंत्रित करने के उद्देश्य से लाया गया था। इसके बाद 1912 तक सैकड़ों पक्षियों को दक्षिणी क्षेत्रों के विभिन्न हिस्सों में छोड़ा गया। कुछ ही वर्षों में ये पक्षी उन क्षेत्रों तक फैल गए, जहां वे पहले प्राकृतिक रूप से मौजूद नहीं थे।
हालिया शोध में यह भी सामने आया है कि सुनियोजित तरीके से छोड़े जाने से पहले भी कूकाबुरा को 1883 में अल्बानी और जून 1896 में पर्थ तथा फ्रीमेंटल के बीच देखा गया था। इसके बावजूद 1897 में इन्हें आधिकारिक रूप से लाने और बसाने की प्रक्रिया शुरू की गई, जिसका व्यापक असर पूरे क्षेत्र पर पड़ा।
विशेषज्ञों के अनुसार, कूकाबुरा को सांपों के नियंत्रण के लिए लाया गया था, लेकिन उनकी शिकारी प्रवृत्ति के चलते वे स्थानीय पक्षियों और छोटे जीवों के लिए खतरा बन गए। यह पक्षी केवल सांपों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कीड़े, सरीसृप, मेंढक और छोटे पक्षियों का भी शिकार करता है।
कंजर्वेशन साइंस वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की रिसर्च के मुताबिक, एक बार स्थापित होने के बाद कूकाबुरा दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों में तेजी से फैल गए। शोध में इस प्रजाति के बसने और विस्तार का विस्तृत उल्लेख किया गया है। इसे उन ऐतिहासिक प्रयासों के संदर्भ में देखा जा रहा है, जब जानबूझकर किसी जीव को ऐसे वातावरण में छोड़ा जाता था, जहां वह मूल रूप से नहीं पाया जाता था।
ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि जिन क्षेत्रों में इन पक्षियों को छोड़ा गया, वहां उन्होंने तेजी से प्रजनन किया और अपनी संख्या बढ़ाई। वर्तमान में दक्षिण-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश हिस्सों में इनकी उपस्थिति दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही किसी विशेष कीट या जीव को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ऐसे कदम उठाए गए हों, लेकिन शिकारी जीव अपने व्यवहार को सीमित नहीं रखते और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव डालते हैं। एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रजातियों को स्थानांतरित करने की यह ऐतिहासिक प्रवृत्ति अब पर्यावरणीय चुनौतियों का कारण बन रही है।
पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया का यह उदाहरण दर्शाता है कि किसी भी जीव को नए इकोसिस्टम में लाने से पहले उसके संभावित पारिस्थितिक प्रभावों का गहन अध्ययन आवश्यक है, अन्यथा इसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ सकते हैं।

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