किस कानून में लिखा आरोपी की जाति पूछी जाए, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डीजीपी से मांगा जवाब
In which law is it written that the caste of the accused should be asked, Allahabad High Court sought answer from DGP

प्रयागराज/उत्तर प्रदेश। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा एफआईआर में जाति लिखने पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी से हलफनामा मांगा है। डीजीपी को बताना होगा कि एफआईआर में जाति लिखना क्यों ज़रूरी है। यह मामला प्रवीण चेत्री नाम के एक व्यक्ति की याचिका से जुड़ा है। चेत्री पर धोखाधड़ी और उत्पाद शुल्क अधिनियम के तहत केस दर्ज है। उन्होंने हाईकोर्ट में एफआईआर रद्द करने की गुहार लगाई थी। जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच 3 मार्च 2025 को इस मामले की सुनवाई कर रही थी।हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि डीजीपी खुद हलफनामा दाखिल करें। उन्हें बताना होगा कि एफआईआर या पुलिस जांच में किसी संदिग्ध की जाति लिखने की क्या वजह है। कोर्ट ने आगे कहा कि हमारे समाज में जातिवाद एक बड़ी समस्या है। यह पुलिस और लोगों की सोच को प्रभावित करता है।
कोर्ट ने याद दिलाया कि संविधान जातिगत भेदभाव को खत्म करने की बात करता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कोर्ट में जाति और धर्म का ज़िक्र करने पर नाराज़गी जताई है। हाईकोर्ट ने डीजीपी से पूछा कि क्या जाति का ज़िक्र करना कानून की ज़रूरत है? या फिर यह सामाजिक न्याय के खिलाफ है? क्या यह संविधान और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के खिलाफ है?
यह पूरा मामला इटावा में शराब तस्करी से जुड़ा है। पुलिस का कहना है कि प्रवीण चेत्री एक गैंग का सरगना है। यह गैंग हरियाणा से शराब लाकर बिहार में बेचता है। तस्करी के दौरान गाड़ियों के नंबर प्लेट भी बदल दिए जाते हैं। पुलिस ने बताया कि उन्होंने मौके से प्रवीण चेत्री समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया था। एफआईआर में सभी आरोपियों की जाति लिखी हुई है।
हाईकोर्ट ने डीजीपी से पूछा है कि क्या जाति का उल्लेख किसी कानूनी आवश्यकता की पूर्ति करता है? या फिर यह सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने वाले संवैधानिक मूल्यों और न्यायिक मिसालों का खंडन करते हुए अनजाने में व्यवस्थागत भेदभाव को कायम रखता है? अदालत ने इस मामले में अगली सुनवाई 12 मार्च को रखी है।
कोर्ट का मानना है कि जाति लिखने से भेदभाव बढ़ सकता है। यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। देखना होगा कि डीजीपी अपने हलफनामे में क्या जवाब देते हैं। क्या वो एफआईआर में जाति लिखने का कोई ठोस कारण बता पाएंगे? इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला अहम होगा। यह फैसला पुलिस की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। साथ ही यह समाज में जातिवाद के खिलाफ लड़ाई में एक अहम कदम साबित हो सकता है। इस फैसले का इंतजार सभी को है।




