जानिए मातंगी माता को क्यों लगाया जाता है जूठन का भोग, कैसा है इनका स्वरूप

दस महाविद्याओं में 9वीं महाविद्या मां मातंगी हैं। इन्हें प्रकृति की स्वामिनी देवी बताया गया है। माता मातंगी के कुछ अन्य नामों सुमुखी, लघुश्यामा या श्यामला, राज-मातंगी, कर्ण-मातंगी, चंड-मातंगी, वश्य-मातंगी, मातंगेश्वरी आदि नामों से भी जाना जाता है। जिस तरह से नवरात्रि में मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। वैसे ही गुप्त नवरात्रि में मां दुर्गा की 10 महाविद्याओं की पूजा की जाती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव का एक नाम मतंग भी हैं। इनकी शक्ति का नाम मातंगी है। मां मातंगी का वर्ण गहरे नीले रंग का है और यह मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करती हैं। मां के 3 नीत्र हैं और रत्नों से जड़े सिंहासन पर आसीन रहती हैं। मातंगी देवी को एक हाथ में गुंजा के बीजों की माला और दूसरे हाथ में वीणा व कपाल है। वह अभय मुद्रा में विराजमान रहती हैं। बता दें कि इन्हें तांत्रिकों की सरस्वती भी कहा जाता है। इन्हें प्रकृति की देवी, वाणी और कला संगीत की देवी भी कहा जाता है। देवी मातंगी हनुमाजी और शबरी के गुरु मतंग ऋषि की पुत्री थीं।
जूठन का लगाया भोग
मान्यता के मुताबिक एक बाच देवी पार्वती की पूजा आराधना करने के दौरान चांडाल महिलाओं ने उन्हें अपना ही जूठन का भोग लगाया था। जिस पर देवगण और शिवगण नाराज हो गए, लेकिन मां पार्वती ने उन की भक्ति देख उस जूठन के भोग को ग्रहण कर लिया था। तभी से मां पार्वती का एक स्वरूप मातंगी कहलाया। देवी मातंगी एकमात्र ऐसी देवी हैं जिनके लिए कोई व्रत आदि नहीं किया जाता है। मातंगी मां सिर्फ वचन और मन से तृप्त होती हैं। वहीं उनको भोग में जूठन चढ़ाई जाती है।
क्यों चढ़ाया जाता है जूठन का भोग
पौराणिक कथाओं के मुताबकि एक बार मां लक्ष्मी श्रीहरि विष्णु के साथ भगवान शिव और मां पार्वती से मिलने कैलाश पर्वत पहुंचे। इस दौरान भगवान श्रीहरि अपने साथ कुछ खाने का सामान भी लेकर आए थे। उस खाने के सामान को श्रीहरि ने भगवान शिव को भेंट कर दिया। जब भगवान शिव और मां पार्वती ने इस भोजन को ग्रहण किया तो इसका कुछ अंश धरती पर गिर गया। उस गिरे हुए भोजन से एक श्याम वर्ण वाली देवी का प्रादुर्भाव हुआ। जो मातंगी देवी के नाम से जानी गईं। इसी कारण मां मातंगी को जूठन का भोग लगाया जाता है।
आज भी भारत के कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और गुजरात आदि राज्यों में मातंग समाज के लोग रहते हैं। कहा जाता है कि मातंग ऋषि ही मेघवाल समाज, मातंग समाज और किरात समाज के पूर्वज थे। कर्नाटक में पंपा सरोवर के पास मतंग ऋषि का आश्रम भी स्थित है, इसी स्थान पर हनुमान जी का जन्म हुआ था।

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