7 महीने की बच्ची से रेप,कोलकाता की पॉक्सो कोर्ट ने दोषी राजीब घोष को दी सजा-ए-मौत
Rape of a 7 month old girl, Kolkata's POCSO court awards death penalty to the accused Rajib Ghosh

- 7 महीने की बच्ची के बलात्कार के लिए फांसी की सजा
- कोर्ट ने इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर माना
- 26 दिनों में आरोपपत्र, ट्रायल 40 दिनों में पूरा
कोलकाता/एजेंसी। पॉक्सो कोर्ट ने सात महीने की बच्ची का बलात्कार करने वाले दोषी को मौत की सजा सुनाई। कोर्ट ने इस अपराध को रेयरेस्ट ऑफ रेयर मानते हुए सजा सुनाते हुए यह फैसला सुनाया। इसके साथ ही अदालत ने पीड़ित बच्ची को 10 लाख रुपये का मुआवजा भी दिया। पीड़िता अभी भी अस्पताल में गंभीर स्थिति में है। कोलकाता के आरजी कर हॉस्पिटल में वह पिछले दो महीने से मौत से जूझ रही है। सुनवाई के दौरान डॉक्टरों ने कोर्ट को बताया कि वारदात के बाद बच्ची के पेट की हड्डी टूट गई। इस केस में कोर्ट ने 80 दिनों के भीतर सुनवाई पूरी की।
कोलकाता की एक पॉक्सो अदालत ने मंगलवार को राजीब घोष उर्फ गोबरा नाम के एक 34 साल के आदमी को फांसी की सजा सुनाई। उसने पिछले साल 30 नवंबर को सात महीने की एक बच्ची का बलात्कार किया था। उसने बुरटोला इलाके में फुटपाथ से बच्ची का अपहरण कर लिया था। उस समय बच्ची अपनी मां के साथ सो रही थी। वारदात को अंजाम देने से पहले राजीब घोष ने तीन बार रेकी की थी। 30 नवंबर की देर रात इलाके के एक निवासी ने फुटपाथ पर बच्ची को रोते हुए देखा, जिसके आसपास कोई नहीं था। सूचना मिलने पर पुलिस ने छानबीन की और बच्ची के माता-पिता का पता लगाया। पुलिस ने ही उसे आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एडमिट कराया था।
तफ्तीश के दौरान पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज खंगाले। तब जांच टीम की नजर लंगड़ाकर चलने वाले एक संदिग्ध पर पड़ी। पब्लिक प्रॉस्क्यूटर बिवास चटर्जी ने बताया कि लंगड़ा चल रहे शख्स को पुलिस ने 7 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया। उसकी पहचान राजीब घोष के तौर पर हुई। इसके बाद कोर्ट में ट्रायल शुरू हुआ, जो 40 दिनों में पूरी हो गई। पुलिस ने 26 दिनों के भीतर आरोपपत्र दाखिल किया। इस दौरान कोर्ट में 24 गवाह पेश किए गए। आरजी कर मेडिकल कॉलेज के सुपरिंटेंडेंट सप्तर्षि चटर्जी ने भी गवाही दी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि बच्ची की पेट की हड्डी पूरी तरह से टूट गई थी और दो महीने में उसका वजन भी नहीं बढ़ा है। इसके बाद कोर्ट ने राजीब घोष को भारतीय न्याय संहिता और पोक्सो अधिनियम की धाराओं के तहत दोषी ठहराया।
मंगलवार को मौत की सजा सुनाते हुए जस्टिस इंद्रिला मुखर्जी मित्रा ने कहा कि इससे ज़्यादा और कोई सज़ा नहीं हो सकती जो अदालत सोच सकती है। विशेष लोक अभियोजक बिवास चटर्जी ने इस फैसले को बंगाल की न्यायिक व्यवस्था के लिए ऐतिहासिक बताया। बचाव पक्ष के वकील ने बार-बार यह तर्क दिया कि बच्ची की जान बच गई है, इसलिए इस केस में मौत की सजा नहीं हो सकती है। विवास चटर्जी ने दलील देते हुए कहा कि कानून के मुताबिक मौत की सजा सुनाने के लिए पीड़िता की मौत होनी जरूरी नहीं है। यह सजा अपराध के तीन महीने से भी कम समय में 80 दिनों के अंदर सुनाई गई है। अदालत ने बच्ची को 10 लाख रुपये का मुआवजा भी दिया है। बच्ची दो महीने से ज़्यादा समय से RG कर अस्पताल में एडमिट है। डॉक्टरों का कहना है कि रेप के कारण उसे हमेशा के लिए नुकसान हो सकता है।




