कोलकाता में मनाई गई ट्राम सर्विस की 153वीं सालगिरह

कोलकाता/एजेंसी। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में कलकत्ता ट्राम सर्विस की 153वीं सालगिरह मनाई गई। इस दौरान दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बनी लकड़ी की ट्रामों की एक खास हेरिटेज राइड का आयोजन किया गया। इस दौरान कलकत्ता ट्राम यूजर्स एसोसिएशन ने दूसरे विश्व युद्ध की गीतांजलि ट्राम को एक खास यादगार राइड के लिए वापस लाए। बड़ी संख्या में लोग इतिहास का एक हिस्सा अनुभव करने के लिए आए और एक ऐसे ट्रांसपोर्ट सिस्टम का जश्न मनाया जो लंबे समय से शहर के सांस्कृतिक ताने-बाने में बुना हुआ है।
ट्राम के शौकीन लोग ट्राम नंबर 498 गीतांजलि की एक खास हेरिटेज राइड के दौरान शंख बजाते हुए। गीतांजलि लकड़ी की बनी दूसरे विश्व युद्ध के समय की ट्राम है, जिसे नोनापुकुर वर्कशॉप में ब्लैकआउट के हालात में बनाया गया था। भारत में ट्राम की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई। शुरु में 24 फरवरी 1873 को कोलकाता (तब कलकत्ता) में पहली घोड़े से खींची जाने वाली ट्राम सेवा शुरू की गई थी। यह सेवा सियालदह से आर्मेनियन घाट तक चली थी। यह भारत में शहरी सार्वजनिक परिवहन की शुरुआत मानी जाती है।
शुरुआत में यह अस्थायी रही, लेकिन 1880 में कलकत्ता ट्रामवेज कंपनी के गठन के बाद व्यवस्थित रूप से फैली। 1902 में कोलकाता में एशिया की पहली इलेक्ट्रिक ट्राम शुरू हुई। इस सेवा ने कोलकाता शहर को विद्युतीकृत ट्रामवे वाला पहला एशियाई शहर बना दिया। ट्राम का विकास मुख्य रूप से कोलकाता में सबसे अधिक हुआ, जहां यह ब्रिटिश काल में प्रमुख परिवहन साधन बनी। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में मुंबई, चेन्नई, दिल्ली, कानपुर, पटना आदि शहरों में भी ट्राम सेवाएं शुरू हुईं।
कोलकाता में 1960 के दशक तक 37 रूट थे, लेकिन धीरे-धीरे बसों, मेट्रो और ट्रैफिक कारणों से अन्य शहरों में ट्राम बंद हो गईं। आज कोलकाता भारत का एकमात्र शहर है जहां ट्राम सेवा अभी भी चल रही है, हालांकि अब बहुत सीमित रूप में (मुख्यतः एक-दो मार्ग जैसे गढ़ियाहाट से एस्प्लेनेड) चलती हैं। अन्य सभी शहरों से ट्राम 1960-70 के दशक तक समाप्त हो चुकी थीं।

तस्वीर: कोलकाता में मनाई गई ट्राम सर्विस की 153वीं सालगिरह, लोगों ने कुछ  ऐसा मनाया ये खास दिन - Divya Kirti

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