महाराष्ट्र में अंधविश्वास से घिरी 300 से ज्यादा महिलाओं को नंदिनी जाधव ने किया जटामुक्त

महाराष्ट्र डेस्क। जब पुणे की विशेष अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में दो आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, तो नंदिनी जाधव भावुक हो गईं। 2012 में नंदिनी महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति से जुड़ी थीं। लेकिन जब 2013 में दाभोलकर की हत्या हुई, तो नंदिनी ने तय कर लिया कि वे अब उन सब कार्यों को पूरा करेंगी, जिन्हें दाभोलकर करना चाहते थे। वे इसे ही उनके प्रति अपनी सच्ची श्रद्धांजलि मानती हैं। नंदिनी ने अपना ब्यूटी पार्लर का काम छोड़ दिया। उन्होंने तय किया कि महिलाओं को ऊपर से खूबसूरत बनाने से ज्यादा जरूरी है, उन्हें अंदर से खूबसूरत बनाना। नंदिनी ने पुणे के आसपास के क्षेत्रों में ऐसी महिलाओं को देखा, जो जटा (जट) रखती थीं। जब उन्होंने इसका कारण जाना, तो बताया गया कि ऐसी धार्मिक मान्यता है कि जटा देवी के आशीर्वाद से आते हैं। यदि इन्हें कटवाया गया, तो कोई भी अनहोनी हो सकती है। इन जटा के जरिए देवी रक्षा करती हैं। कई महिलाओं के जटा इतने लंबे होते हैं कि उनकी गर्दन भार से एक ओर झुक जाती है। उन्हें पीठ और सिर में दर्द होता रहता है। बालों में इतनी गंदगी जमा हो जाती है कि कीड़े पड़ जाते हैं।
शुरू में नंदिनी के लिए इन महिलाओं को यह समझाना बहुत मुश्किल रहा कि ये सिर्फ अंधविश्वास है। इन जटाओं को रखने से उनकी सेहत पर गलत असर पड़ रहा है। लेकिन महिलाएं अपनी धार्मिक मान्यताओं पर डंटी रहती हैं। कई महिलाएं इसलिए इसके खिलाफ नहीं जातीं, क्योंकि उन्हें समाज का डर रहता है। नंदिनी महिलाओं की लगातार काउंसिलिंग करती हैं। कई बार एक-एक महिला को जटा कटवाने के लिए राजी करने में 7-7 साल का वक्त लग जाता है। नंदिनी अभी तक करीब 300 महिलाओं को जटामुक्त कर जागरूक कर चुकी हैं। इस तरह की धार्मिक मान्यता महाराष्ट्र और कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में अधिक देखने को मिलती है।
झेलना पड़ता है अपमान, मिली धमकियां
नंदिनी बताती हैं कि जटा रखने वाली महिलाओं को इसके नुकसान बताकर इन्हें काटने का काम आसान नहीं है। कई बार जब उन महिलाओं के परिजन और गांववालों को इस तरह की खबर लगती है, तो वे धमकी भरे कॉल करते हैं। कहते हैं कि यह धार्मिक मान्यता है। यदि इसे बदलने की कोशिश की गई, तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे। कई बार गंदी-गंदी गालियां सुनने को मिलती हैं। कई मर्तबा ऐसा हुआ, जब हमें गांव में नहीं घुसने दिया गया। लेकिन ऐसे मौकों पर धैर्य से काम लेना पड़ता है। लोगों को यह समझाने में वक्त लगता है कि वे कानून के खिलाफ जा रहे हैं। यह महाराष्ट्र में लागू अंधविश्वास और काला जादू विरोधी अधिनियम का उल्लंघन है।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ अशिक्षित और ग्रामीण अंचल के लोग इस तरह की अंधश्रद्धा के शिकार हैं, बल्कि कई पढ़े-लिखे लोग भी धार्मिक अंधविश्वास की ज़द में आ जाते हैं। नंदिनी बताती हैं कि एक इंजिनियर युवती भी जटा रखती थी। उसे जब उसकी गृह सहायिका ने बताया कि यह दैवीय कृपा है। यदि वह जटा कटाएगी, तो उसके साथ अनहोनी हो सकती है। इसके बाद वह युवती जटा रखने के लिए गृह सहायिका की बात मान गई। इसी तरह एक बैंक मैनेजर की पत्नी भी जटा रखती थी। उसे यह यकीन दिलाने के लिए लंबी काउंसिलिंग करनी पड़ी कि यह अंधविश्वास है।
वे बताती हैं कि जब महिलाएं अपने जटा कटाने को राजी हो जाती हैं, तो उनकी यही शर्त होती है कि वे मुझसे ही जटा कटाएंगी। मैं जटा काटने के बाद महिलाओं को खूबसूरत लुक देने की कोशिश करती हूं। इसमें मेरे ब्यूटीशियन होने का तजुर्बा काम आता है। जब मुझे पता चलता है कि फलां गांव में फलां महिला जटा कटवाने के लिए राजी हो गई है, तो मैं तत्काल उस गांव के लिए अपनी बाइक से निकल जाती हूं। मैं एथलीट भी हूं, इसलिए मुझे दौड़भाग में परेशानी नहीं होती। मुझे भय रहता है कि कहीं महिला को आसपास के लोग गुमराह न कर दें, इसलिए मैं तत्काल पहुंचती हूं। कई जगहों पर नाई और डॉक्टर भी इस तरह की मान्यताओं की जद में आ जाते हैं कि वे भी इसे दैवीय चमत्कार मानकर जटाओं से छेड़छाड़ करने से बचते हैं।




