चार साल की बच्ची से दरिंदगी के बाद हत्या के केस में गाजियाबाद पुलिस को सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा
सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर और एसएचओ को किया तलब

गाजियाबाद में 4 वर्षीय बच्ची के साथ हुई बर्बरता के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने दो निजी अस्पतालों द्वारा इलाज से इनकार, पुलिस की एफआईआर में देरी और मेडिकल रिपोर्ट में कथित हेरफेर पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
गाजियाबाद। सुप्रीम कोर्ट ने चार वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या मामले की जांच में गाजियाबाद पुलिस द्वारा अपनाए गए ”असंवेदनशील रवैये” पर शुक्रवार को नाराजगी जताई और रिकार्ड के साथ पुलिस आयुक्त सहित वरिष्ठ अधिकारियों को 13 अप्रैल को तलब किया। कहा कि इस मामले की अदालत की निगरानी में समयबद्ध जांच की आवश्यकता है, चाहे वह विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा की जाए या किसी केंद्रीय एजेंसी द्वारा।
‘वीडियो सबूत ने अंतरात्मा झकझोर दी’
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने पीडि़त के पिता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एन हरिहरन की दलीलों पर ध्यान दिया और मामले में राज्य पुलिस द्वारा अब तक की गई जांच के तरीके पर नाराजगी व्यक्त की। हरिहरन ने पीठ से कहा, वीडियो सुबूत देखते ही मेरा अंतरात्मा झकझोर उठा। उन्होंने मामले में न्यायिक हस्तक्षेप की अपील की।
अस्पतालों और पुलिस की भूमिका पर सवाल
सीजेआई ने कहा कि अपराध का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इसमें दो कथित निजी अस्पतालों के साथ-साथ स्थानीय पुलिस का पूर्ण रूप से उदासीन और असंवेदनशील रवैया झलकता है। घटना के एक दिन बाद एफआईआर दर्ज की गई। अस्पतालों ने भर्ती करने से इनकार कर दिया। बच्ची के प्राइवेट पार्ट में कठोर वस्तु डाली गई।
हरिहरन ने अदालत को बताया कि पुलिस इसे हत्या मानकर जांच करना चाहती थी। पुलिस रिपोर्ट में कहा गया है कि मामला उसके पास आने पर बच्ची मृत थी। एक वीडियो रिकाॅर्डिंग है, जिसमें बच्ची जीवित दिख रही है। पड़ोसियों को नोटिस जारी किए गए हैं कि वे शांति भंग कर रहे हैं।
एफआईआर में गंभीर धाराएं नहीं जोड़ी गईं
अदालत ने राज्य सरकार, थाना अधिकारी, दो निजी अस्पतालों—खजान ¨सह मानवी हेल्थ केयर तथा सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल और कार्यकारी मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी किए। पीठ ने कहा कि जब मामले की सूचना स्थानीय पुलिस को दी गई तो पीडि़त परिवार का दुख और भी बढ़ गया। संज्ञान लेने के बजाय, याचिकाकर्ता और परिवार के सदस्यों के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार किया गया। उन्हें घटना के बारे में चुप रहने के लिए कहा गया। एफआइआर अगले दिन यानी 17 मार्च को दर्ज की गई। पाक्सो के तहत कोई अपराध या दुष्कर्म का आरोप एफआईआर में नहीं जोड़ा गया, हालांकि मामला स्पष्ट रूप से यौन उत्पीड़न से संबंधित था।
अगली सुनवाई 13 अप्रैल को पीठ ने आदेश दिया कि गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त और नंदग्राम पुलिस के एसएचओ स्वयं उपस्थित रहें। पीडि़त बच्ची को भर्ती करने से इनकार करने वाले निजी अस्पतालों को नोटिस भेजा जाए। मामले की सुनवाई सोमवार को सूचीबद्ध की जाए। अदालत ने पुलिस और अस्पतालों को निर्देश दिया कि वे पीडि़ता और उसके परिवार के सदस्यों की पहचान उजागर न करें।




