अमेरिका-ईरान वार्ता से लाइमलाइट में पाकिस्तान, हाई अलर्ट पर इस्लामाबाद
शांति वार्ता से पहले पाकिस्तान के नूर खान बेस के पास दिखा अमेरिकी वायुसेना का विमान

इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच होने वाली महत्वपूर्ण वार्ता पर दुनिया की नजर है। सीजफायर के बाद यह बातचीत पश्चिम एशिया का भविष्य तय कर सकती है, जिससे पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में आ गया है।
इस्लामाबाद/एजेंसी। इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच होने वाली अहम वार्ता पर पूरी दुनिया की नजर टिकी है। सीजफायर के बाद यह बातचीत पश्चिम एशिया के भविष्य को तय कर सकती है। इस मौके पर पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में आ गया है। इस्लामाबाद में तैयारियां जोरों पर हैं। शहर में रेड अलर्ट जारी किया गया है, 10 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं और कई इलाकों को सील कर दिया गया है। शनिवार 11 अप्रैल को होने वाली इस बैठक में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची जैसे बड़े नेता शामिल हो सकते हैं। पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ा मौका है, क्योंकि लंबे समय बाद अमेरिका का इतना बड़ा प्रतिनिधिमंडल यहां पहुंच रहा है।
1960 के दशक में अमेरिका के राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ने पाकिस्तान का दौरा किया था। उस समय कराची शहर को खास तरीके से सजाया गया था और सड़कों पर इत्र तक छिड़का गया था। इस दौरे के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को आर्थिक और सैन्य मदद बढ़ा दी थी, जिससे दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत हुए। उस समय पाकिस्तान को अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी माना जाने लगा था।
1961 में अमेरिका के उपराष्ट्रपति लिंडन जॉनसन पाकिस्तान दौरे पर आए थे। इसी दौरान कराची में उनकी मुलाकात एक ऊंट गाड़ी चलाने वाले बशीर अहमद से हुई। यह मुलाकात दोस्ती में बदल गई और बशीर को अमेरिका भी बुलाया गया। यह कहानी आज भी पाकिस्तान में एक मिसाल के रूप में सुनाई जाती है। बाद में जॉनसन राष्ट्रपति बनने के बाद भी पाकिस्तान आए और नेताओं से मुलाकात की।
पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका
1969 में अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन पाकिस्तान आए और उन्होंने जनरल याह्या खान के जरिए चीन से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की। पाकिस्तान ने इस भूमिका को सफलतापूर्वक निभाया और बाद में अमेरिका-चीन संबंधों में सुधार का रास्ता खुला। यह पाकिस्तान की कूटनीतिक ताकत का एक बड़ा उदाहरण माना जाता है।
1984 में उपराष्ट्रपति जॉर्ज बुश और बाद में 2000 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भी पाकिस्तान आए। क्लिंटन का दौरा खास इसलिए रहा क्योंकि उन्होंने सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ से सार्वजनिक रूप से दूरी बनाई। इसके बाद 2000 के दशक में डिक चेनी और जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने भी पाकिस्तान का दौरा किया, जहां आतंकवाद और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा हुई। इन दौरों के दौरान सुरक्षा काफी कड़ी रही और कई बार दौरे गुप्त तरीके से भी हुए।
हाल के दौर में बढ़ती अहमियत
अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति जो बाइडन ने 2009 और 2011 में पाकिस्तान का दौरा किया था और दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत करने की बात कही थी। उन्हें पाकिस्तान का एक बड़ा नागरिक सम्मान भी दिया गया था। अब एक बार फिर ईरान-अमेरिका वार्ता के जरिए पाकिस्तान वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गया है, और इस बातचीत का असर पूरे पश्चिम एशिया और दुनिया पर पड़ सकता है।
पाकिस्तान की राजधानी में इस शुक्रवार एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक हलचल देखी गई। चार्ल्सटन लिखे एक अमेरिकी वायुसेना के परिवहन विमान को रावलपिंडी के नूर खान एयरबेस पर उतरते देखा गया। अमेरिकी विमान के आगमन ने उन अटकलों को हवा दे दी है कि वार्ता के लिए प्रतिनिधिमंडलों का आना शुरू हो गया है। सूत्रों के अनुसार, इस वार्ता के लिए इस्लामाबाद के रेड जोन और विशेष रूप से सेरेना होटल के आसपास सुरक्षा को अभूतपूर्व स्तर पर बढ़ा दिया गया है। नूर खान एयरबेस, जो अतीत में कई बार क्षेत्रीय तनावों का केंद्र रहा है, फिलहाल अमेरिकी और पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों की कड़ी निगरानी में है।




