यहां लैट्रिन की देवी को पूजते हैं लोग, बाथरूम के बाहर जलाते हैं दीया, आधी रात को होता है खास अनुष्ठान

बीजिंग/एजेंसी। क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया में ऐसा भी फेस्टिवल मनाया जाता है जहां लोग लैट्रिन या बाथरूम की देवी की पूजा करते हैं? जी हां, चीन में ये पूजा सदियों से की जा रही है। यहां हर साल चाइनीज न्यू ईयर के बाद लैंटर्न फेस्टिवल मनाया जाता है। इस दौरान ‘टॉयलेट गॉडेस’ या ‘ज़िगु’ की पूजा की जाती है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी कुछ ग्रामीण इलाकों में नजर आती है। आइये आपको बताते हैं इस खास त्योहार के बारे में।
इस त्योहार में लोग बाथरूम के बाहर दीया जलाते हैं। आधी रात को खास अनुष्ठान करते हैं और देवी से भविष्य की जानकारी मांगते हैं। सुनने में अजीब लगता है, लेकिन यह चीनी लोक संस्कृति का हिस्सा है। ज़िगु को ‘पर्पल लेडी’ या ‘लेडी ऑफ द लैट्रिन’ भी कहा जाता है। किंवदंती के अनुसार, वह एक गरीब महिला थी, जिसे जलन में उसके प्रेमी की पत्नी ने मार डाला था. कहानी दो रूपों में प्रचलित है। एक में टांग राजवंश के दौरान शानक्सी प्रांत में एक सुंदर महिला हे मेई को लिस्ट्री के मालिक की पत्नी ने ईर्ष्या में 15 जनवरी (लूनर कैलेंडर) की रात टॉयलेट में मार डाला था। उसकी आत्मा ने बदला लेने की कोशिश की, तो स्वर्ग ने उसे टॉयलेट की देवी बना दिया। दूसरी कहानी में वह हान राजा लियू बांग की पत्नी चिड़ फ्यूजन थी, जिसे रानी लू द्वारा क्रूरता से मारा गया और टॉयलेट में फेंक दिया गया था। लोगों ने उसकी दया से उन्हें देवी का दर्जा दिया।
लैंटर्न फेस्टिवल की रात (चाइनीज न्यू ईयर के 15वें दिन, जो 3 मार्च को था) महिलाएं घर के आउटहाउस (पुराने टॉयलेट) को अच्छे से साफ करती है। फिर स्ट्रॉ, कपड़े या पेपर से ज़िगु की लाइफ-साइज मूर्ति या पुतला बनाती हैं। इसे टॉयलेट, किचन या पिगपेन के पास रखा जाता है क्योंकि किंवदंती में देवी को इन जगहों पर यातना दी गई थी। पूजा में दीया जलाया जाता है, अगरबत्ती लगाई जाती है और खास मंत्र पढ़े जाते है। अनुष्ठान का मुख्य हिस्सा फॉर्च्यून टेलिंग है। लोग देवी से सवाल पूछते हैं– फसल कैसी होगी? परिवार में सुख-शांति रहेगी? लड़का होगा या लड़की? एक ट्रे पर राख बिछाकर, चॉपस्टिक, झाड़ू या बांस की सीड रखकर देवी को आमंत्रित करते हैं। पुतला हिलता है या ऑटोमैटिक राइटिंग होती है, जिससे जवाब मिलता है। कुछ जगहों पर स्पिरिट मीडियम की तरह काम करता है। यह रस्म मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा की जाती है, क्योंकि ज़िगु को महिलाओं के दर्द और अन्याय की देवी माना जाता है। वह कमजोर महिलाओं की रक्षक है। यह परंपरा सॉन्ग और किंग राजवंशों में बहुत लोकप्रिय थी, लेकिन आज आधुनिक शहरों में लगभग खत्म हो चुकी है। फिर भी ग्रामीण इलाकों और कुछ प्रांतों में यह जीवित है।

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