60 साल का इंतजार खत्म, 99 हिंदू बंगाली परिवारों को मिलेगा आशियाना, पुनर्वास से बदलेगी सूरत

मेरठ/उत्तर प्रदेश। मवाना तहसील के हस्तिनापुर के खादर क्षेत्र स्थित ग्राम नंगला गोसाई में झील किनारे दशकों से रह रहे 99 हिंदू बंगाली परिवारों के स्थायी पुनर्वास का रास्ता आखिरकार खुल गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इन परिवारों को कानपुर देहात की रसूलाबाद तहसील में बसाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। सरकार के इस फैसले से कानूनी अड़चनें तो खत्म हुई हैं।
कैबिनेट के फैसले के मुताबिक, इन 99 परिवारों को दो गांवों में बसाया जाएगा। 50 परिवारों को ग्राम भैंसाया में पुनर्वास विभाग के नाम दर्ज 27.50 एकड़ भूमि पर और शेष 49 परिवारों को ग्राम ताजपुर तरसौली में 26.009 एकड़ भूमि पर स्थान मिलेगा। प्रत्येक परिवार को 0.50 एकड़ जमीन दी जाएगी। यह जमीन 30 वर्षों के पट्टे पर होगी, जिसे दो बार 30-30 साल के लिए नवीनीकृत किया जा सकेगा। इस तरह अधिकतम 90 वर्षों तक का पट्टा संभव होगा। सरकार का कहना है कि इस निर्णय से इन परिवारों को स्थायी आवास, खेती-बाड़ी की सुविधा और कानूनी पहचान मिलेगी।
दरअसल, ये परिवार मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से विस्थापित होकर करीब 60 साल पहले भारत आए थे। पहले वे उत्तराखंड पहुंचे, जो उस समय उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। बाद में हस्तिनापुर क्षेत्र के नंगला गोसाई गांव के खादर इलाके में बस गए। झील किनारे दलदली जमीन को मेहनत से भरकर रहने लायक बनाया, कच्चे-पक्के मकान खड़े किए और इस बस्ती को रामगढ़ बंगाली बस्ती नाम दिया। सरकारकी ओर से समय-समय पर शौचालय, सड़क, पानी, सौर लाइट, आधार कार्ड, वोटर कार्ड और आयुष्मान स्वास्थ्य योजना जैसी सुविधाएं भी मिलीं।
यह जमीन सिंचाई विभाग की बताई जाती रही और झील से अतिक्रमण हटाने को लेकर एनजीटी ने जिला प्रशासन को आदेश दिए। कई बार पुलिस, राजस्व और वन विभाग की टीमें कब्जा हटाने पहुंचीं, मगर विरोध के चलते कार्रवाई टलती रही। मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा और शासन स्तर पर लंबे समय से पुनर्वास पर विचार चल रहा था। विभिन्न स्थानों पर जमीन चिन्हित हुई, लेकिन आवास के साथ कृषि भूमि की मांग के कारण फैसला अटका रहा।
प्रभावित परिवारों का दर्द इससे अलग है। उनका कहना है कि आधा एकड़ जमीन परिवारों के लिए नाकाफी है। कई परिवार संयुक्त हैं, बच्चों की संख्या अधिक है और आजीविका पूरी तरह खेती पर निर्भर है। ऐसे में वे कम से कम तीन एकड़ जमीन या फिर मेरठ में ही रहने की अनुमति की मांग कर रहे हैं। वहीं युवाओं का कहना है कि यहां रहकर वे पढ़ाई, नौकरी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। अचानक कानपुर भेजे जाने से उनका भविष्य पीछे चला जाएगा। उनका तर्क है कि यहां एक बसाई हुई बस्ती को उजाड़ने की बजाय समाधान मेरठ में ही निकाला जाना चाहिए।

60 साल का इंतजार खत्म, 99 हिंदू बंगाली परिवारों को मिलेगा आशियाना, पुनर्वास  से बदलेगी सूरत

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