ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर खेली गयी दूध, मक्खन और मठ्ठे से गजब की होली

An amazing Holi was played with milk, butter and buttermilk at an altitude of 11 thousand feet

देहरादून/एजेंसी। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में 11000 फीट की ऊंचाई पर शुक्रवार को लोग दूध, मक्खन और मठ्ठे से सराबोर नजर आए। मौका था उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल में बटर फेस्टिवल का। प्रकृति और स्थानीय देवताओं का आभार जताने के लिए सदियों से चली आ रही है परंपरा का इस साल भी पूरे रीति रिवाज के साथ निर्वहन किया गया।
शुक्रवार को अंडूडी महोत्सव की शुरुआत सोमेश्वर देवता की डोली की पूजा-अर्चना के साथ हुई। जिसके बाद सोमेश्वर देवता और राधा-कृष्ण बने पात्रों ने मक्खन की मटकी फोड़ कर मक्खन की होली मनाने की शुरुआत की गई। कुछ ही देर बाद लोग दूध, मक्खन और मठ्ठे से तर नजर आये। इस दौरान उत्सव में पहुंचे सैकड़ों लोगों ने ढोल-दमाऊ की थाप पर जमकर नृत्य किया।
रासौ नृत्य करते हुए स्थानीय लोगों और पर्यटकों में अलग ही उत्साह और उमंग दिखाई दिया। इस दौरान गंगोत्री विधायक सुरेंद्र चौहान मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम में शामिल हुए। विधायक चौहान पर्यटकों और स्थानीय ग्रामीणों के साथ नृत्य करते नजर आए। उन्होंने इस रमणीक स्थान में आयोजित बटर फेस्टिवल में आए सभी लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह त्यौहार अपने-आप में अनोखा है और इसमें देश-विदेश के लोग भी बढ़-चढ़कर शामिल होना चाहते हैं।
उन्होंने पर्यटकों को रमणीक बुग्याल में आने और प्रकृति का दिव्य दर्शन करने की भी अपील की है। इस दौरान विधायक सुरेश चौहान का ब्रह्म कमल की माला पहनकर स्वागत किया गया। वहीं समिति के अध्यक्ष मनोज राणा ने बटर फेस्टिवल को और भव्य बनाने की बात कही है। राणा ने बताया कि उच्च हिमालय के इस बुग्याल क्षेत्र में पशुपालक अपने पशुओं के साथ रहते हैं। अपने पशुओं के साथ-साथ प्रकृति की रक्षा करने को भी वे अपना दायित्व समझते हैं। प्रकृति से मिलने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ के बदले प्रकृति का आभार जताने के लिए यह उत्सव मनाया जाता है। इस दौरान छानियों में खीर बनाई जाती है।
उत्तरकाशी के रैथल गांव से लगे दयारा बुग्याल में 28 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले बुग्याल में यह बटर फेस्टिवल मनाया जाता है। इस आयोजन के लिए ग्रामीण कई दिनों से तैयारी करते हैं। जिसकी खुशी और सांस्कृतिक उत्साह लोगों में अलग ही नजर आता है। स्थानीय लोग इसे अंडूडी उत्सव के नाम से जानते हैं लेकिन बटर फेस्टिवल के रूप में इसे ज्यादा पहचान मिली है। पिछले 20 सालों से यह उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है।
बुग्याल की मखमली घास में दही, मक्खन और मठ्ठे से होली खेली जाती है। प्रकृति और मानव के बीच मधुर संबंध के साथ ही प्रकृति का आभार जताने के लिए यह होली खेली जाती है। वहीं मान्यता है कि मैदान में चरते समय मवेशियों को बुरी ताकतों से बचाने के लिए भगवान कृष्ण हमेशा मौजूद रहते हैं और उनका आभार जताने के लिए तथा समृद्ध पशुपालन की कामना के लिए यह लोकपर्व मनाया जाता है।
रैथल गांव के ग्रामीण हर साल अपने पशुओं के साथ गर्मियां शुरू होते ही 7 किलोमीटर दूर बुग्याल स्थित छानियों में चले जाते हैं। बुग्याल में कई किलोमीटर तक फैले बुग्याल की घास मवेशियों के लिए आदर्श चारागाह होती है। यहां उगने वाले औषधीय गुणों से भरपूर पौधों से दुधारू मवेशियों के दुग्ध उत्पादन में भी अप्रत्याशित वृद्धि होती है।
मानसून खत्म होने के साथ ही जब सर्दियां दस्तक देने लगती हैं तो ग्रामीण अपने मवेशियों के साथ वापस गांव लौटने लगते हैं। अपने गांव वापस जाने से पहले दयारा बुग्याल में मवेशियों और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए, दुधारू पशुओं के दूध में वृद्धि के लिए प्रकृति और स्थानीय देवताओं का आभार जताना ग्रामीण नहीं भूलते हैं।
प्रकृति का आभार जताने के लिए ही ग्रामीण सदियों से इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। भाद्रपद माह की संक्रांति के दिन यह उत्सव भव्य रूप से मनाया जाता है। उत्तराखंड में प्रकृति का आभार जताने के लिए इस तरह की अनूठी होली का आयोजन सिर्फ दयारा बुग्याल में ही होता है। पिछले दो दशकों से दयारा पर्यटन उत्सव समिति द्वारा बुग्याल में ग्रामीणों के साथ यह आयोजन कर रही है। वहीं देश-विदेश से हजारों पर्यटकों के आने से अब इस बटर फेस्टिवल की पहचान भी खूब बढ़ गई है।

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