राम-जानकी और हनुमान के लिए कपड़े बना रहा ‘अल्लाह’ का बंदा

सीतामढ़ी/बिहार। दशकों से भगवान, सनातनी देवी-देवताओं के लिए कपड़ों की सिलाई करते आ रहे अब्दुल और उनका परिवार इन दिनों कुछ अधिक चर्चा में है। हिंदू देवी-देवताओं के कपड़ों की सिलाई कर अल्लाह का यह बंदा सामाजिक सद्भाव की सुंदर मिसाल पेश कर रहा है। अयोध्या में 22 जनवरी को होने वाले रामलला के प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर मां जानकी की जन्मस्थली सीतामढ़ी भी चर्चा में है। भगवान श्रीराम और माता जानकी को लेकर अयोध्या और सीतामढ़ी भक्तिमय बना हुआ है। इस खुशनुमा माहौल में अब्दुल कादिर और उनका परिवार सामाजिक सद्भाव वाली मिठास घोलकर इस माहौल को और खुशनुमा कर रहे है। वह सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रहे है।
तीन पीढ़ियों से सिलाई का काम
सीतामढ़ी शहर के अब्दुल कादिर और उनके पुत्र सुहैल पिछले तीन पीढ़ियों से जानकी स्थान स्थित राम, लक्ष्मण, जानकी और हनुमान और कोट बाजार स्थित दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर समेत शहर के अन्य मंदिरों के भगवान के लिए कपड़ा सिलते हैं। नवरात्र समेत विभिन्न धार्मिक आयोजन पर शहर के लोग भगवान को चढ़ाने के लिए इन्हीं के पास कपड़ा सिलवाते रहे हैं। अभी रामोत्सव की धूम है। लिहाजा काम बढ़ गया है। अब्दुल रोजाना 40 से 50 कपड़ों की सिलाई कर रहे है। इसके अलावा राम पताका का भी निर्माण कराया जा रहा है। अब्दूल कादिर का कोट बाजार स्थित हनुमान मंदिर के समीप ‘परिवार टेलर्स’ नामक दुकान है।
पांच दशक पुरानी है दुकान
यह दुकान अब्दुल के दादा मुस्तफा ने पांच दशक पूर्व खोली थी। इसके बाद अब्दुल कादिर और अब उनके पुत्र सुहैल कपड़ों की सिलाई करते है। इनकी दुकान की खास विशेषता यह है कि हिंदू देवी देवताओं के लिए कपड़ों की सिलाई करते है। यही वजह है कि वे सामाजिक सद्भाव की मिसाल बन गए है। 26 बसंत पार कर चूके सुहैल एक सवाल के जवाब में बताते है कि यह तो उनका पेशा है। स्नातक तक की शिक्षा हासिल कर अपने पुश्तैनी कारोबार में लगे सुहैल को ईश्वर, अल्लाह, गॉड और वाहे गुरु में कोई फर्क नहीं नजर आता है। कहते है कि ईश्वर एक है।
देवी-देवताओं की उन पर कृपा
बताते है कि मंदिर के ठीक पास होने की वजह से वह और उनके पुरखे भगवान और देवी-देवताओं के लिए कपड़ों की सिलाई करते रहे है। उनके दादा मुस्तफा, पिता अब्दुल कादिर के बाद वह लगातार भगवान के लिए कपड़ा सिलते रहे है। सिलाई की कोई कीमत नहीं है। जो मिलता है रख लेते है। मैट्रिक पास करते ही वह अपने पिता के काम में हाथ बांटना शुरू किये, जो अब भी जारी है। बताते है कि देवी-देवताओं के कपड़े सिलने की वजह से उन्हें उनकी कृपा मिल रहीं है। शायद यही वजह है कि उन्हें कभी किसी चीज की कमी नहीं हुई और धंधा भी अच्छा खासा चल रहा है। दो बच्चे है, उनकी पढ़ाई-लिखाई चल रही है। इन दिनों रामोत्सव को लेकर भगवान के लिए कपड़ा सिलवाने वालों की डिमांड काफी बढ़ गई है।

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