अखण्ड भारत की परिकल्पना में हमारी भूमिका

अखण्ड भारत की परिकल्पना प्रत्येक देशवासियों को करना चाहिए। उसके लिए हर एक देश वासी अपने कर्त्तव्यों को पूरा करने में दिन रात जुट जाएं।
समय कम है और आत्मबल भारी है।
पुनः उपमहाद्वीप बनाने की तैयारी है।।
हमारे प्रधानमंत्री जब बार बार आत्मनिर्भर भारत और लोकल इज ओकल की बात करते है तो आप मान लें की आप अपनी मातृभूमि के लिए कितने ईमानदार हैं। हम आज भी दूसरों पर आश्रित हैं चाहे सरकार हो या परिवार हो या अन्य। डिपेंडेंसी से बाहर आये और लोकल इज वोकल को सार्थक करने के लिए आत्मनिर्भर बनें। नौकरी पाने की दौड़ छोड़, नौकरी देने वाला बनें। हम अखण्ड भारत को साकार करने के लिए पड़ोसी या सीमावर्ती देशों का रुख कर सकते हैं। वहाँ हमारे स्टार्टअप को नई ऊंचाई मिलेगी और देश का मान बढ़ेगा। वहाँ के लोगों को रोजगार मिलने से उनका पुनः भारत के प्रति स्नेह और लगाव बढ़ेगा।
।।जम्बू द्वीपे भरतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते भारतवर्षे….अमुक…।
हमारे देश मे लाखों मठ, आश्रम, मंदिर और ख्याति प्राप्त साधू, संत, महात्मा, आचार्य, प्रवचन कर्ता और बाबा हैं। इनका अपने सनातनी धर्म के प्रचार, प्रसार में बड़ा योगदान है। इन्होंने मुख्यतः कई टीवी चैनल्स, प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से करोड़ो लोगों तक अपनी पहुंच बनाई हैं। मेरे व्यक्तिगत विचार से यदि ये पड़ोसी और सीमावर्ती राज्यों और देशों का रुख कर वहाँ अपने मठ, आश्रम और अनुयायी बनाए तो इससे पुरातन सनातन भारत अखंड हो सकता है साथ ही इन्हें अपने प्रवचन और अन्य धार्मिक कार्यक्रम पड़ोसी और सीमावर्ती राज्यों और देशों में बढ़ाना चाहिए। धर्म गुरुओं की धार्मिक सक्रियता यदि सीमावर्ती देशों में बढ़ती है तो भविष्य में हमसे अलग हुए सीमावर्ती देशों के पुनः भारत मे शामिल होने की संभावना बढ़ जाएगी।
इस्लाम और ईसाई धर्म की उत्पत्ति के पूर्व लिखित प्राचीन ग्रंथ अनुसार :-
”हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थान प्रचक्षते॥
(बृहस्पति आगम)
पड़ोसी देशों में तिब्बत, म्यांमार, नेपाल, भूटान और श्रीलंका को हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में ही भारतवर्ष में विलय हो जाना चाहिए। ये देश हमारे थे और आज भी हमारे हैं कुछ मुगल काल कुछ अंग्रेजो के समय अलग हुए किंतु यहाँ सनातनियों की बहुसंख्या मौजूद है और इन्होंने इस्लाम और ईसाईयों के आतंक से अपनी लड़ाई जारी रखी है। हमारी सुप्तावस्था, लाचारी, अनदेखी और स्वार्थ की भावना ने इन्हें चीन पर आश्रित होने के लिए मजबूर किया। ये वैदिक काल से हमारे होकर हम से दूर हो गये।
विश्व के सबसे बड़े संगठन राष्ट्रीय स्वयं संघ के कई सहयोगी संगठन उनके आयाम, उपवर्ग और प्रकोष्ठों में मौजूद स्वयं सेवक सनातन छोड़ चुके भारतीयों को पुनः वापसी का मार्ग प्रशस्त करें। अपनी सभी गतिविधियों को स्वयं सेवक बढ़ाएं और पुरानी गतिविधियाँ जो छोड़ चुके हैं उन्हें पुनः चालू करें। महत्वपूर्ण यह है कि अखण्ड भारत की परिकल्पना को साकार करने में संघ की भूमिका बड़ी होनी चाहिए। घर वापसी और शुद्धिकरण जैसे एक सूत्रीय कार्यक्रम निरंतर चलने चाहिए। आरएसएस और उनके सहयोगी संगठनों को देश के सीमावर्ती देशों में अपनी गतिविधियां बढ़ानी चाहिए। विद्या भारती के संस्थान भी सीमावर्ती राज्यों से लेकर पड़ोसी देशों तक होना चाहिए।
केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों को आगे आना चाहिए सीमावर्ती राज्यों और देशों में अपनी सक्रियता बढ़ाने के साथ वहाँ विकास के कार्यक्रमो को नई दिशा देनी पड़ेगी। नई रणनीति के साथ उन्हें साथ लाना होगा वहाँ के जन मानस से लेकर राजनीत में अपनी भूमिका तय करनी होगी। विदेश मंत्रालय को अपने दायित्व बोध में एक अखण्ड भारत की परिकल्पना को प्राथमिकता देनी होगी।
इस विषय में हमारा वायु पुराण कहता है।
सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत।
(वायु 31-37, 38)
देवब्रत त्रिपाठी(देव),(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं)




