ट्रक चलाकर पाला परिवार, बनीं उत्तर प्रदेश रोडवेज की पहली महिला बस चालक

गाजियाबाद ब्यूरो। पति की मौत के बाद 30 वर्षीय प्रियंका पर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया। 15 सौ रुपये महीने की नौकरी की, जिसमें पेट भी पालना मुश्किल था। दुकान खोली तो वह भी नहीं चली। पेट भरने और बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रियंका ने ट्रक चलाना शुरु कर दिया। मुश्किलें बहुत आईं लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अब प्रियंका उत्तर प्रदेश की पहली महिला बस चालक बन गई हैं। वह कौशांबी डिपो की बस चला रही हैं। न केवल बस के यात्री बल्कि हर कोई उनके हुनर, हिम्मत और जज्बे को सलाम कर रहा है। प्रियंका शर्मा मूलरूप से बिहार के बांका जिले के हरदौड़ी गांव की रहने वाली हैं। फिलहाल वह अभी दिल्ली के शालीमार बाग में अपने पिता विनय शर्मा के साथ रहती हैं। वर्ष 2002 में प्रियंका की शादी राजीव से हुई। उनके दो बेटे 12 वर्षीय आनंदराज और 10 वर्षीय निपुन कुमार हैं। अधिक शराब पीने के कारण राजीव की दोनों किडनी खराब हो गईं।

इलाज में प्रियंका के सारे गहने और राजीव का घर बिक गया। 2015 में राजीव की मौत हो गई। इसके बाद प्रियंका और उनके दोनों बेटे बेसहारा हो गए। प्रियंका ने बताया कि उनके पास तन पर कपड़े के अलावा कुछ भी नहीं था। बच्चों को पढ़ाकर काबिल बनाने के लिए वह मेहनत कर पैसा कमाने के लिए दिल्ली चली आईं। यहां पर उन्होंने मात्र 15 सौ रुपये महीने की एक बर्तन बनाने वाली फैक्ट्री में काम किया। इतने पैसों में वह बच्चों की परवरिश नहीं कर पा रहीं थीं। इसी बीच काम के दौरान उनकी अंगुली कट गई। उन्होंने नौकरी छोड़ दी। एक साल तक चाय की दुकान चलाई लेकिन इससे भी कोई कमाई नहीं हुई। प्रियंका बताती हैं कि दुकान नहीं चली तो उनके पास घर के किराए के भी पैसे नहीं थे। उन्हें झुग्गी में रहना पड़ा। किसी तरह वह बच्चों का पेट भर पा रहीं थी लेकिन स्कूल की फीस जमा करने के लिए पैसे नहीं थे। बच्चों के भविष्य की चिंता सता रही थी। इसी बीच उनकी मुलाकात कासगंज के सुभाष यादव से हुई।

उन्होंने प्रियंका को ट्रक चलाना सिखाया और लाइसेंस भी बनवाया। ट्रक चलाने पर उनके माता-पिता दो छोटे भाई और बहन ने बात करना बंद कर दिया। पैसा बचाने के लिए उन्होंने अपने बेटे निपुन को बतौर हेल्पर कई महीनों तक साथ रखा। पैसा कमाने के बाद परिवार की हालत सुधरी दोनों बच्चों को पढ़ने के लिए बिहार के भागलपुर स्थित सेंट कोलंबस स्कूल के हास्टल में डाल दिया।प्रियंका का कहना है कि वह स्कूल की छह माह की फीस एक साथ जमा करती हैं, जिससे नौकरी जाने पर उनके बच्चों की पढ़ाई न प्रभावित हो। गुवहाटी में उनका ट्रक बदमाशों ने लूट लिया। उनके साथ मारपीट भी की। ट्रक चलाने के दौरान विभिन्न परेशानियां आईं लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

प्रियंका ने बताया कि बीती फरवरी में उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (यूपीएसआरटीसी) की ओर से महिला चालक की वैकेंसी आई। उन्होंने आवेदन किया। पूरे प्रदेश से 21 महिलाओं की कानपुर में ट्रेनिंग हुई। प्रियंका ने पहले से ही देशभर में ट्रक चलाया था तो उनके लिए बस चलाना बेहद आसान हो गया। प्रियंका पूरे प्रदेश में पहली ऐसी महिला हैं जो उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के विभिन्न जिलों के लिए बस चला रही हैं।

वह कौशांबी से जब बस लेकर निकलती हैं तो बस में सवार महिला व पुरुष यात्रियों के लिए मिसाल बन जाती है। उनकी सराहना करते हुए लोग बधाई देते हैं। जिन जिलों में बस लेकर जाती हैं वहां के भी लोग उनकी हिम्मत, हुनर और जज्बे को सलाम करते हैं। प्रियंका का कहना है कि मैंने जीवन में बहुत दुख देखा। कभी हार नहीं मानी। अब उम्मीद है कि मेरे भी जीवन में खुशियों का बसर होगा।

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