जदयू से निकाले गए अनंत सिंह के बेटों की सियासी राह क्या होगी? नई पार्टी, दूसरे दल या निर्दलीय चुनाव लड़ने के विकल्पों पर चर्चा तेज
अनंत सिंह ने पार्टी से निकाले जाने के बाद ऐलान कर दिया था कि वो अपनी पार्टी बनाएंगे, लेकिन पार्टी बनाने और चलाना आसान नहीं है।

पटना,एजेंसी। जनता दल यूनाइटेड (जदयू) से निष्कासित किए जाने के बाद बिहार के बाहुबली नेता और मोकामा विधायक अनंत सिंह की राजनीतिक रणनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। अनंत सिंह पहले ही अपने बेटों को चुनाव लड़ाने की इच्छा जता चुके हैं। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि वह अपने परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कौन-सा रास्ता चुनेंगे। उनके सामने अपनी पार्टी बनाने, बेटों को किसी स्थापित राजनीतिक दल में शामिल कराने या निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारने जैसे विकल्प हो सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में अभी कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।
अनंत सिंह के सामने पहला विकल्प अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाने का है। इससे उन्हें अपनी शर्तों पर राजनीति करने और बेटों को संगठन में आगे बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। लेकिन किसी नए राजनीतिक दल को खड़ा करना, संगठन का विस्तार करना और चुनाव में प्रभावी प्रदर्शन करना आसान नहीं होगा। इसके लिए मजबूत संगठन, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और व्यापक जनसमर्थन जरूरी है। बिहार की राजनीति में नए दलों के सामने आने वाली चुनौतियों को प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के चुनावी प्रदर्शन से भी समझा जा सकता है। वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज के किसी भी उम्मीदवार को जीत नहीं मिली थी। हालांकि, अनंत सिंह का स्थानीय राजनीतिक प्रभाव और किसी नए दल की संभावनाएं अलग-अलग परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी।
दूसरा विकल्प अपने बेटों को किसी स्थापित राजनीतिक दल के जरिए राजनीति में आगे बढ़ाने का हो सकता है। अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से विधायक रह चुकी हैं। ऐसे में राजद के साथ संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा हो सकती है। इसके अलावा, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी भी एक संभावित विकल्प के रूप में देखी जा सकती है। अनंत सिंह के बेटे अभिषेक सिंह और अंकित सिंह जुड़वां भाई हैं, जबकि अभिनव सिंह उनके सबसे छोटे बेटे हैं। हालांकि, बेटों के किसी दल में शामिल होने को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
तीसरा विकल्प बेटों में से किसी एक को मोकामा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतारना हो सकता है। अनंत सिंह का मोकामा क्षेत्र में लंबे समय से राजनीतिक प्रभाव रहा है। वर्ष 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की थी, जबकि उस समय बिहार में जदयू और राजद का गठबंधन था। इस जीत ने क्षेत्र में उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ को रेखांकित किया था। हालांकि, उनके प्रभाव का उनके बेटों को कितना लाभ मिलेगा, यह चुनावी परिस्थितियों, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा।
अनंत सिंह के लिए अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी का चयन केवल चुनाव लड़ाने तक सीमित नहीं होगा। उन्हें यह भी तय करना होगा कि बेटों को किस राजनीतिक मंच से उतारा जाए और उनके लिए संगठनात्मक समर्थन कैसे जुटाया जाए। नई पार्टी बनाने की स्थिति में संगठन खड़ा करने की चुनौती होगी, जबकि किसी स्थापित दल से जुड़ने पर पार्टी की रणनीति और स्थानीय समीकरणों के अनुरूप चलना पड़ सकता है। निर्दलीय चुनाव लड़ने पर व्यक्तिगत जनाधार और स्थानीय समर्थन की अहम भूमिका होगी।
फिलहाल अनंत सिंह और उनके परिवार की अगली राजनीतिक रणनीति को लेकर बिहार की सियासत में अटकलें जारी हैं। उनके बेटों के चुनाव लड़ने, संभावित सीट और राजनीतिक दल को लेकर स्थिति तभी स्पष्ट होगी, जब परिवार की ओर से कोई औपचारिक घोषणा की जाएगी। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अनंत सिंह अपने परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कौन-सा रास्ता चुनते हैं।




