गांगुली के लॉर्ड्स सेलिब्रेशन से मिली तारा को आजादी की प्रेरणा, प्लाबिता बोरठाकुर ने फिल्म ‘दूसरा’ में अभिनय से जीता दिल

प्लाबिता बोरठाकुर, अंकुर विकल और ट्विशा जोशी स्‍टारर फिल्‍म 'दूसरा' शुक्रवार, 23 अक्‍टूबर को स‍िनेमाघरों में रिलीज हो गई है। अभिनय देव के डायरेक्‍शन में बनी यह स्‍पोर्ट्स-ड्रामा कैसी है, जानने के लिए ये रिव्यू पढ़ें-

एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में वर्ष 2002 का लॉर्ड्स मैदान पर हुआ नेटवेस्ट ट्रॉफी का फाइनल आज भी याद किया जाता है। इंग्लैंड को हराने के बाद तत्कालीन भारतीय कप्तान सौरव गांगुली का बालकनी में अपनी टी-शर्ट लहराना केवल जीत का जश्न नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के नए आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया था। निर्देशक अभिनय देव की फिल्म ‘दूसरा’ इसी ऐतिहासिक पल को एक लड़की की आजादी, आत्मसम्मान और सामाजिक बंदिशों से संघर्ष की कहानी से जोड़ती है। महज 78 मिनट की यह फिल्म क्रिकेट की यादों के सहारे एक सामाजिक सवाल उठाती है—क्या किसी लड़की को अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए?
‘दिल्ली बेली’ जैसी चर्चित फिल्म बना चुके अभिनय देव ने ‘दूसरा’ में खेल और समाज के बीच एक अलग रिश्ता तलाशने की कोशिश की है। फिल्म की कहानी राजस्थान के एक रूढ़िवादी परिवार में पली-बढ़ी तारा के इर्द-गिर्द घूमती है। परिवार और समाज की तय की गई सीमाओं के बीच तारा के अपने सपने हैं, अपनी इच्छाएं हैं और अपनी पहचान बनाने की चाहत भी। लेकिन परंपराओं की जकड़न उसे बार-बार अपनी मर्जी से जिंदगी जीने से रोकती है।
इसी दौरान भारतीय क्रिकेट टीम की नेटवेस्ट ट्रॉफी में ऐतिहासिक जीत और लॉर्ड्स की बालकनी में गांगुली का बेबाक जश्न तारा के भीतर भी साहस जगाता है। फिल्म इस ऐतिहासिक घटना को क्रिकेट की जीत तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत करती है। यही विचार फिल्म को एक अलग पहचान देता है।
निर्देशक अभिनय देव की कोशिश सराहनीय है कि उन्होंने खेल की एक यादगार घटना को सीधे-सीधे क्रिकेट फिल्म बनाने के बजाय सामाजिक बदलाव की कहानी में पिरोया। वास्तविक क्रिकेट फुटेज, बीते दौर की यादों और काल्पनिक कथानक का मेल फिल्म को रोचक बनाता है। कई दृश्यों में निर्देशन संवेदनशील नजर आता है और यह बात उभरकर सामने आती है कि किसी दूसरे की जीत भी किसी के जीवन में बदलाव की शुरुआत बन सकती है। हालांकि, फिल्म की सीमित अवधि के कारण तारा के संघर्ष और उसके भावनात्मक संसार को कुछ जगहों पर अधिक विस्तार नहीं मिल पाता। कहानी के कुछ हिस्से और गहराई से विकसित किए जा सकते थे।
तारा के किरदार में प्लाबिता बोरठाकुर फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं। उन्होंने एक ऐसी लड़की की बेचैनी, खामोशी और भीतर पलते विद्रोह को सहजता से पर्दे पर उतारा है, जो अपने परिवार से जुड़ी रहना चाहती है, लेकिन अपनी स्वतंत्र पहचान भी तलाशती है। उनका अभिनय किरदार को विश्वसनीय बनाता है और दर्शक तारा की मनःस्थिति से जुड़ पाते हैं। अंकुर विकल ने तारा के पिता की भूमिका में प्रभाव छोड़ा है। उनका किरदार बेटी के प्रति स्नेह और पुरानी सामाजिक मान्यताओं के बीच उलझा दिखाई देता है। बाल कलाकार त्विशा जोशी की मासूमियत प्रभावित करती है, जबकि समीधा गुरु और कृष्णा गोकानी सहित अन्य कलाकारों का काम भी कहानी को सहारा देता है।
फिल्म की रिलीज से पहले सौरव गांगुली की ओर से उठाए गए कानूनी सवालों ने भी इसे चर्चा में ला दिया। गांगुली और उनकी अधिकृत बायोपिक का निर्माण कर रही लव फिल्म्स एलएलपी ने आरोप लगाया कि फिल्म में उनकी पहचान, व्यक्तित्व और वर्ष 2002 के ऐतिहासिक लॉर्ड्स सेलिब्रेशन का उचित अनुमति के बिना व्यावसायिक इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की थी। 22 अक्टूबर को दिल्ली उच्च न्यायालय ने 23 अक्टूबर को प्रस्तावित सिनेमाघर रिलीज पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया और मामले की आगे सुनवाई निर्धारित की। यह अंतरिम राहत थी; इससे गांगुली की ओर से उठाए गए कानूनी सवालों का अंतिम निपटारा नहीं हुआ। फिल्म निर्माताओं का कहना है कि ‘दूसरा’ गांगुली की बायोपिक नहीं, बल्कि एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो क्रिकेट के ऐतिहासिक क्षण से प्रेरणा लेती है।
राम संपत का संगीत फिल्म के भावनात्मक माहौल के अनुरूप है। पुराने क्रिकेट फुटेज कहानी को ऐतिहासिक संदर्भ देते हैं, जबकि संपादन तारा की निजी जिंदगी और क्रिकेट के मैदान के दृश्यों के बीच तालमेल बनाने में मदद करता है। फिल्म का तकनीकी पक्ष अपनी सीमाओं के भीतर कहानी को आगे बढ़ाता है।
कुल मिलाकर, ‘दूसरा’ एक अलग विषय और विचार के साथ बनाई गई फिल्म है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह क्रिकेट की जीत को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की कहानी से जोड़ती है। प्लाबिता बोरठाकुर का प्रभावशाली अभिनय और अभिनय देव का प्रयोगात्मक निर्देशन इसे देखने लायक बनाते हैं। हालांकि, पटकथा को कुछ स्थानों पर अधिक भावनात्मक विस्तार की जरूरत महसूस होती है, फिर भी फिल्म का मूल विचार असर छोड़ता है। क्रिकेट प्रेमियों के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर आधारित सिनेमा पसंद करने वाले दर्शकों को भी यह फिल्म आकर्षित कर सकती है। ‘दूसरा’ याद दिलाती है कि कभी-कभी किसी की एक बेबाक जीत किसी दूसरे के जीवन में बदलाव की चिंगारी जगा देती है।

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