दरियाई घोड़े नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बने ‘सिलिकॉन पंप’, मारा नदी में 76 प्रतिशत तक योगदान
नई रिसर्च में खुलासा, घास के मैदानों से नदियों तक सिलिकॉन पहुंचाकर जलीय खाद्य जाल को प्रभावित करते हैं हिप्पो

वॉशिंगटन,एजेंसी। दरियाई घोड़े यानी हिप्पो केवल घास चरने और पानी में आराम करने वाले विशालकाय जीव नहीं हैं, बल्कि वे जमीन और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक हालिया शोध के अनुसार, हिप्पो रात में घास के मैदानों में चरते हैं और दिन में नदी में गोबर करते हैं। इस प्राकृतिक प्रक्रिया के जरिए वे जमीन से सिलिकॉन को पानी तक पहुंचाते हैं, जो जलीय जीवन और खाद्य जाल के लिए अहम है।
‘साइंस एडवांसेज’ पत्रिका में प्रकाशित ‘हिप्पोपोटामस एम्फिबियस: द एनिमल सिलिकॉन पंप’ शीर्षक वाले अध्ययन में बताया गया है कि केन्या की मारा नदी में सूखे मौसम के दौरान दरियाई घोड़े प्रतिदिन लगभग 0.4 मीट्रिक टन सिलिकॉन पहुंचाते हैं। शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक, मसाई मारा क्षेत्र में सिलिकॉन के प्रवाह में हिप्पो का योगदान 76 प्रतिशत तक हो सकता है। यह अध्ययन दर्शाता है कि बड़े वन्यजीव जमीन और जल आधारित पारिस्थितिकी तंत्र के बीच पोषक तत्वों के आदान-प्रदान को किस तरह प्रभावित करते हैं।
घास से नदी तक कैसे पहुंचता है सिलिकॉन
शोधकर्ताओं ने फरवरी 2014 में दक्षिण-पश्चिमी केन्या में मारा नदी के किनारे नमूने एकत्र किए। इस क्षेत्र में दरियाई घोड़े रात के समय सवाना के घास के मैदानों में भोजन करते हैं और दिन में नदी के गहरे हिस्सों में समूह बनाकर रहते हैं। घास से प्राप्त सिलिकॉन उनके पाचन तंत्र से गुजरने के बाद गोबर के माध्यम से नदी में पहुंच जाता है। इस तरह सिलिकॉन मिट्टी में रुकने वाली कुछ प्राकृतिक प्रक्रियाओं को पार करते हुए सीधे जलीय वातावरण तक पहुंचता है।
अध्ययन के मुताबिक, हिप्पो प्रतिदिन लगभग 42 मीट्रिक टन सूखी घास खाते हैं और करीब 11.1 मीट्रिक टन सूखा गोबर नदी में छोड़ते हैं। इस प्रक्रिया से प्रतिदिन लगभग 0.4 मीट्रिक टन सिलिकॉन नदी तक पहुंचता है। शोध के दौरान मारा नदी में प्रतिदिन लगभग 7.9 मीट्रिक टन घुला हुआ सिलिकॉन और 2.4 मीट्रिक टन जैविक स्रोतों से प्राप्त सिलिकॉन बहने का अनुमान लगाया गया।
नदी में सिलिकॉन की मात्रा पर पड़ता है असर
शोधकर्ताओं ने नदी के करीब 250 मीटर लंबे हिस्से में 24 घंटे तक निगरानी की, जहां 80 तक दरियाई घोड़े मौजूद थे। इस दौरान नदी के ऊपरी हिस्से की तुलना में नीचे की ओर जैविक स्रोतों से प्राप्त सिलिकॉन की मात्रा लगभग दोगुनी पाई गई। प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों से यह भी पता चला कि ताजे हिप्पो के गोबर में मौजूद जैविक सिलिकॉन का लगभग 2.8 प्रतिशत हिस्सा 24 घंटे के भीतर बारिश के पानी में घुल गया।
यह अनुपात प्रयोग की परिस्थितियों में बिना पची घास से निकलने वाले सिलिकॉन की तुलना में 17.2 गुना अधिक था। शोधकर्ताओं ने विभिन्न आंकड़ों के आधार पर गणितीय मॉडल तैयार किया, जिससे पता चला कि अध्ययन क्षेत्र में सिलिकॉन के प्रवाह पर दरियाई घोड़ों का योगदान 76 प्रतिशत तक हो सकता है।
डायटम और जलीय खाद्य जाल के लिए महत्वपूर्ण
सिलिकॉन नदी और झीलों में पाए जाने वाले डायटम नामक सूक्ष्म शैवाल के लिए आवश्यक तत्व है। डायटम इसका उपयोग अपनी कांच जैसी कोशिका भित्ति बनाने में करते हैं। ये सूक्ष्म जीव जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में प्राथमिक उत्पादन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और अनेक दूसरे जीवों के लिए भोजन उपलब्ध कराते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, नदियों में सिलिकॉन की आपूर्ति कम होने से डायटम और अन्य शैवालों के बीच संतुलन बदल सकता है। इसका असर जलीय खाद्य जाल पर भी पड़ सकता है। अध्ययन में पूर्वी अफ्रीका की विक्टोरिया झील और अन्य झीलों के संदर्भ में भी इस प्रक्रिया के संभावित महत्व पर विचार किया गया है।
गोबर से पोषक तत्व भी पहुंचते हैं, लेकिन बढ़ सकती है चुनौती
दरियाई घोड़े अपने गोबर के माध्यम से सिलिकॉन के अलावा कार्बनिक पदार्थ और अन्य पोषक तत्व भी नदियों तक पहुंचाते हैं। ये पदार्थ जलीय जीवों के लिए उपयोगी संसाधन बन सकते हैं। हालांकि, पानी में कार्बनिक पदार्थों की अत्यधिक मात्रा उसकी गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में हिप्पो की भूमिका के सकारात्मक और संभावित नकारात्मक, दोनों पहलुओं को समझना जरूरी है।
यह अध्ययन बताता है कि वन्यजीवों का महत्व केवल उनके अपने आवास तक सीमित नहीं होता। दरियाई घोड़े जैसे बड़े जीव जमीन से पोषक तत्वों को जल प्रणालियों तक पहुंचाकर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं।




