संतान की लम्बी आयु की कामना का पर्व है अहोई अष्टमी : महंत शिव सागर भारती

भारतीय समाज में प्रत्येक त्यौहार का अपना एक विशेष महत्व है। ऐसे प्रत्येक अवसर पर की जाने वाली पूजा तथा व्रत में कोई न कोई विशेष उद्देश्य निहित होता है। कार्तिक कृष्ण पक्ष में तो वैसे भी तिथि-त्यौहारों की भरमार रहती है।अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद आता है। करवा चौथ पर महिलाएं पति की दीर्घायु की कामना के लिए व्रत करती हैं तो अहोई अष्टमी पर संतान की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत करती हैं। रात में तारों को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण करती हैं और फिर जल ग्रहण करती हैं। यह व्रत अहोई मैय्या को समर्पित होता है। अहोई अष्टमी का पर्व दीपावली के आरम्भ होने की सूचना देता है। विशेष अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन किया जाता है। विशेष तौर पर यह पर्व माताओं द्वारा अपनी सन्तान की लम्बी आयु व स्वास्थ्य कामना के लिए किया जाता है। पुत्रवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्वपूर्ण है। जिन माता-पिता को अपने सन्तान की ओर से स्वास्थ्य व आयु की दृष्टि से चिंता बनी रहती हो। इस पर्व पर सन्तान की माता द्वारा समुचित व्रत व पूजा करने का विशेष लाभ प्राप्त होता है। सन्तान स्वस्थ होकर दीर्घायु को प्राप्त करती हैं।
अहोई अष्टमी के दिन माता पार्वती की पूजा का विधान है। दरअसल माता पार्वती संतान की रक्षा करने वाली देवी मानी गई हैं। पौराणिक मान्यता है कि इस व्रत के प्रताप से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस व्रत के प्रताप से बच्चों की रक्षा होती है, वहीं इसे संतान प्राप्ति के लिए भी सर्वोत्तम माना गया है। अहोई अष्टमी व्रत के संबंध में मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से संतान फल की प्राप्ति होती है और जो महिलाएं पूरे विधि-विधान से यह व्रत रखती हैं, उनके बच्चे दीर्घायु होते हैं। जिन महिलाओं की संतान का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता हो, बच्चे बार-बार बीमार पड़ते हों, ऐसे बच्चों के स्वास्थ्य लाभ तथा दीर्घायु प्राप्ति के लिए अहोई अष्टमी व्रत किया जाता है। जिन दम्पत्तियों के पुत्र नहीं बल्कि पुत्री सन्तान है वे भी अहोई माता की पूजा कर सकती हैं। सन्तान की कामना वाली महिलाएं भी यह व्रत रखकर अहोई माता से सन्तान प्राप्ति की प्रार्थना कर सकती हैं।हालांकि इस व्रत के संबंध में यह नियम भी माना जाता है कि एक साल यह व्रत करने के बाद यह व्रत आजीवन नहीं टूटना चाहिए अर्थात् प्रतिवर्ष किया जाना चाहिए।
अहोई का अर्थ है, ‘जो अनहोनी से बचाए’ और इसे ‘अहोई अष्टमी’ इसीलिए कहा जाता है क्योंकि किसी भी अमंगल या अनिष्ट से अपने बच्चों की रक्षा के लिए महिलाओं द्वारा किया जाने वाला यह व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी को मनाया जाता है। चूंकि यह व्रत अष्टमी के दिन पड़ता है, इसीलिए इसे ‘अहोई आठे’ भी कहा जाता है। विशेषकर उत्तर भारत में इस व्रत का विशेष महत्व है। करवा चौथ की ही भांति महिलाएं इस दिन भी कठोर व्रत रखती हैं और दिनभर पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करती। अंतर केवल इतना है कि करवा चौथ व्रत में जहां महिलाएं चन्द्रमा को अर्ध्य देकर व्रत खोलती हैं, वहीं अहोई अष्टमी व्रत तारे निकलने के बाद सायंकाल में तारों को अर्ध्य देकर खोला जाता है। चूंकि इस दौरान चंद्रोदय बहुत देर से होता है, इसीलिए तारों को ही अर्ध्य देकर व्रत खोलने की परम्परा चली आ रही है। हालांकि कुछ महिलाएं चंद्रोदय तक इंतजार करती हैं और चंद्रमा को अर्ध्य देकर ही व्रत खोलती हैं।
अहोई माता के चित्रांकन में ज्यादातर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास सेह तथा उसके बच्चों की आकृतियां बना दी जाती हैं। उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अहोई माता का स्वरूप वहां की स्थानीय परम्परा के अनुसार बनता है। सम्पन्न घर की महिलाएं चांदी की अहोई बनवाती हैं। जमीन पर गोबर से लीपकर कलश की स्थापना होती है। अहोई माता की पूजा करके उन्हें दूध चावल का भोग लगाया जाता है। तत्पश्चात एक पाटे पर जल से भरा लोटा रखकर कथा सुनी जाती है। अहोई माता की पूजा के लिए गेरू से दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाते हैं तथा साथ ही सेह और उसके बच्चों का चित्र भी बनाते हैं। सन्ध्या में आरती के समय के उपरान्त मां का पूजन करने के बाद अहोई माता की कथा सुनते हैं। पूजा के बाद सास-ससुर के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त कर बाहर आकाश में दीपक अर्पित करके तारों की पूजा कर जल चढ़ाते हैं। तारों को करवा से अर्घ्य भी दिया जाता है। इस दौरान अहोई माता का जाप भी करते हैं। अष्टमी का चांद देखने के उपरान्त व्रत पूजन पूरा हो जाता है और इसके पश्चात व्रती को जल ग्रहण करके व्रत का समापन करना होता है। पूजा के उपरान्त इस दिन लाल धागे की रक्षा सूत्र बांधकर पुत्र अथवा पुत्री को दीर्घायु का आशीर्वाद देना चाहिए!
अहोई अष्टमी का व्रत मनाए जाने के संबंध में कुछ दंतकथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथानुसार प्राचीन काल में दतिया नगर में चंद्रभान नामक एक व्यक्ति रहता था, जिसकी बहुत सी संतानें थीं लेकिन दुर्भाग्यवश उसकी सभी संतानें अल्पायु में ही अकाल मृत्यु को प्राप्त होने लगी। अपने बच्चों की इस प्रकार अकाल मृत्यु से पति-पत्नी बहुत दुखी रहने लगे। उसके बाद काफी लंबे समय तक उनके कोई संतान न होने से उदास होकर पति-पत्नी अपनी सारी धन दौलत का त्याग कर वन की ओर प्रस्थान कर गए। बद्रिकाश्रम के निकट स्थित जलकुंड के पास पहुंचकर वे उसी स्थान पर अपने प्राण त्यागने का निश्चय करके अन्न-जल का त्याग कर वहीं उपवास पर बैठ गए। एक-एक कर इसी प्रकार छह दिन बीत गए और तब एकाएक आकाशवाणी हुई, ‘‘हे साहूकार! तुम्हें यह दुःख तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों के कारण मिल रहा है। इन पापों के प्रभाव से मुक्ति के लिए तुम्हें अहोई अष्टमी के दिन व्रत का पालन कर अहोई माता की पूजा-अर्चना करनी होगी, जिससे प्रसन्न हो अहोई माता ही तुम्हें पुत्र प्राप्ति के साथ-साथ उसकी दीर्घायु का वरदान भी देंगी।’’ आकाशवाणी सुन पति-पत्नी ने पूरे विधि-विधान से अहोई अष्टमी का व्रत किया और अहोई माता से अपने पूर्व जन्म के पापों की क्षमा याचना की, जिससे प्रसन्न होकर अहोई माता ने उन्हें संतान प्राप्ति और उसकी दीर्घायु का वरदान दिया। मान्यता है कि तभी से अहोई अष्टमी व्रत मनाए जाने की परम्परा प्रचलित हो गई।
आज के समय में भी माताओं द्वारा अपनी सन्तान की ईष्टकामना के लिए अहोई माता का व्रत रखा जाता है और सांयकाल अहोई मता की पूजा की जाती है तो निश्चित रूप से इसका शुभफल उनको मिलता ही है और सन्तान चाहे पुत्र हो या पुत्री उसको भी निष्कंटक जीवन का सुख मिलता है। अहोई व्रत के दिन प्रात उठकर स्नान करें और पूजा पाठ करके अपनी संतान की दीर्घायु एवं सुखमय जीवन हेतु कामना करते हुए, मैं अहोई माता का व्रत कर रही हूं ऐसा संकल्प करें। अहोई माता मेरी संतान को दीर्घायु, स्वस्थ एवं सुखी रखे। अनहोनी को होनी बनाने वाली माता देवी पार्वती हैं। इसलिए माता पार्वती की पूजा करें। अहोई माता की पूजा के लिए गेरू से दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाएं और साथ ही सेह और उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएं। सन्ध्या काल में इन चित्रों की पूजा करें।
सौजन्य से : महंत शिव सागर भारती,
(रजादेपुर मठ,आजमगढ़,उत्तर प्रदेश)




