“कश्मीर से हिन्दुओं का निष्कासन मात्र सनातन संस्कृति का ही नहीं सम्पूर्ण सनातन जीवशैली का विनाश है”: सुशील पंडित

दिल्ली ब्यूरो। कश्मीर घाटी से कश्मीरी हिन्दुओं के निष्कासन की त्रासदी के तैंतीस वर्ष पूरे होने पर मेजर सरस त्रिपाठी द्वारा मालवीय स्मृति संस्थान दीन दयाल उपाध्याय मार्ग दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम के एक व्याख्यान मे बोलते हुए सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता, विचारक और राष्ट्र चिन्तक सुशील पंडित ने कहा। कश्मीर में चल रहे आतंकवाद को उन्होंने “जिहाद” बताया और कहा कि यह भारत के पूर्ण इस्लामीकरण के हजारों साल से चल रहे संघर्ष का यह हिस्सा है। कश्मीर, जहां नीलमत पुराण की रचना हुई, जहां चाणक्य ने तक्षशिला में शिक्षा ग्रहण की, अभिनव गुप्त ने जहां भाषा और व्याकरण सिंद्धान्त दिये, जहां अधिकांश संस्कृत साहित्य लिखा गया, जहां राजतरंगिणी की रचना हुई, जहां कनिष्क ने चौथी “बौद्ध संगीति” बुलाई जहां सनातन ही नहीं बौद्ध धर्म भी पल्लवित पुष्पित हुआ; वहां आज कोई संस्कृत जानने वाला नहीं है।

आज से ठीक 33 वर्ष पूर्व लगभग 65,000 कश्मीरी हिंदू परिवार अपना सब कुछ छोड़ कर आनन-फानन में जो भी साधन मिला, उससे  जम्मू की ओर पलायन किए।  पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद और इस्लामिक कट्टरपंथियों का “ग़जवा-ए-हिन्द” और “दार-उल-इसलाम” का सपना देखने के कारण यह सब हुआ। ऐसी स्थिति में लगभग 3.5 लाख कश्मीरी हिन्दू जैसे-तैसे भाग कर कश्मीर घाटी के बाहर, जहां जिसे जगह मिली, शरण ले ली। भारतीय संस्कृति, पुरातत्व, मूर्तिकला, शिल्प-कला का अकल्पनीय नुकसान हुआ है। मंदिर खाली पड़े हैं। वहां कोई पूजा करने वाला नहीं है।

विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते कश्मीर की संस्कृति और बौद्ध साहित्य की मर्मज्ञ डाक्टर अद्वैतवादिनी कौल ने कहा की 1989 के पहले कश्मीर लगभग 1500 “सजीव” मन्दिर थे जहां पूजा अर्चना होती थी। अब मात्र 1000 बचे हैं। शेष पिछले 33-34 वर्षो में नष्ट कर दिए गए। उन्होंने कश्मीर को भारतीय संस्कृति और शिक्षा का प्रमुख केन्द्र बताया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सुप्रसिद्ध विद्वान डाक्टर शशिशेखर तोशखानी ने कहा की कश्मीर में इतने मन्दिर और पवित्र स्थान थे की तिल रखने की जगह नहीं थी। आज वहां हिन्दू मंदिरों में पुजारी नहीं है। यह एक सम्पूर्ण संस्कृति का विनाश है। उन्होंने कहा कि कश्मीर में यह पहली बार नहीं हुआ है। इस्लामिक आक्रमण और बलात धर्म परिवर्तन के कारण मात्र 11 परिवार बचे थे जिनसे कश्मीरी पंडितों की पीढ़ियां आगे बढ़ी थी। आज की स्थिति उससे भी बद्तर है। पलायन तो प्रतिदिन ही हो रहा था लेकिन 19 जनवरी 1990 की रात को सामूहिक पलायन हुआ। “द कश्मीर फाइल्स” इन त्रासदियों का एक दस्तावेज है।

कार्यक्रम दो हिस्सों में संपन्न हुआ। पहले हिस्से में गणमान्य विद्वान अतिथियों द्वारा “कश्मीर के सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन पर आतंकवाद का प्रभाव” विषय पर व्याख्यान हुआ। उसके बाद एक विस्थापित कश्मीरी पंडित श्रीमती मीनाक्षी रैना द्वारा लिखित पुस्तक “कश्मीर-द डिवाइन एंड द डेस्टिनी” (Kashmir – The Divine And The Destiny) का लोकार्पण हुआ। श्रीमती मीनाक्षी रैना ने बताया की यह पुस्तक एक उपन्यास है जो सत्य घटनाओं पर आधारित है। यह कश्मीर की त्रासदी का एक आइना है। उन्होंने कहा की कश्मीर में मेरा बचपन बीता और अब मैं कनाडा में रहती हूं लेकिन कश्मीर की मधुर स्मृतियां मेरे जीवन का अभिन्न अंग है।

विषय विवेचना करते हुए प्रोफेसर सत्य देव पाराशर ने कहा कि कश्मीरी पंडितों पर हुए इस अत्याचार के लिए कहीं न कहीं सम्पूर्ण भारत दोषी है। उस समय मैं सरकार का हिस्सा था और जानता हूं सरकार ने अपना दायित्व पूरा नहीं किया।कार्यक्रम का संचालन स्वयं मेजर सरस त्रिपाठी ने किया और कश्मीर में अपने सैनिक अभियान का अनुभव बीच-बीच में बताते रहे। सुशील पंडित के विचारों का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा की कट्टरपंथियों का लक्ष्य भारत को एक इस्लामिक स्वतंत्र राष्ट्र बनाना है। उन्हें खुरासान से अराकान तक “दार-उल-इसलाम” चाहिए और कश्मीर का आतंकवाद “गजव-ए-हिंद” का हिस्सा है।”धन्यवाद ज्ञापन सुप्रसिद्ध प्रसारक, रेडियो- विधा-विशषज्ञ और लेखक श्री जैनेन्द्र सिंह ने किया।

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