मरने के बाद भी अभियुक्तों पर औरंगाबाद कोर्ट में चलता रहा मुकदमा, 57 साल बाद पता चला सच

औरंगाबाद,(बिहार)। औरंगाबाद की एक अदालत में 57 साल तक मकदमा चलता रहा। मामले में नामजद बनाए गए अभियुक्तों के खिलाफ अदालती खिलाफ कार्रवाई चलती रही। कोर्ट से समन, वारंट, जमानती वारंट, गैरजमानतीय वारंट, कुर्की जब्ती और फरारी घोषित होने की कार्रवाई होती रही। लेकिन अभियुक्त कोर्ट नहीं पहुंचे। मुकदमा चलते हुए 57 साल बीत गए, तब जाकर पता चला कि मामले के चारों नामजदों, जिन्हें कोर्ट में बार-बार तलब किया जा रहा है, वे तो कब के स्वर्ग सिधार गए हैं। यह बात जब कोर्ट के संज्ञान में आई तब जिला विधिक सेवा प्राधिकार ने पहले करते हुए मामले को खत्म कर दिया।

मिली जानकारी के अनुसार, 23 नवम्बर 1966 को औरंगाबाद के कुटुम्बा थाना में एक प्राथमिकी दर्ज हुई थी। थाना से मामला औरंगाबाद की अदालत में आया। कोर्ट में मुकदमा चलने लगा। इसी बीच मामले में 11 साल बाद एक प्रोटेस्ट कम्पलेंट के जरिए पुनः जीआर केस नंबर 1597/77 दर्ज हुआ। इस केस में भी न्यायिक प्रक्रिया आरंभ हुई। मामला कई अदालतों से होते हुए वर्तमान में न्यायिक दंडाधिकारी नेहा दयाल की कोर्ट में पहुंचा। इस मामले में चार अभियुक्तों सिमरा निवासी रामचंद्र सिंह, जगनारायण नोनिया, राम दहिन नोनिया और सुमी नोनिया को कोर्ट में हाजिर होने के लिए लम्बे समय से तलब किया जा रहा था। लेकिन अभियुक्त नहीं कोर्ट नहीं पहुंच रहे थे।

इस पर जज साहिबा ने जिला पुलिस प्रशासन के लिए संबंधित अभियुक्तों की खोजबीन और उनकी जानकारी जुटाने का फरमान जारी कर दिया। पुलिस ने जब अभियुक्तों के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की तो पता चला कि चारों अभियुक्तों की कई साल पहले ही मौत हो गई थी। इसके बाद कोर्ट को मामले की हकीकत से बाकिफ कराया गया। इस पर कोर्ट ने अभियुक्तों का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश देते हुए केस को खत्म कर दिया।

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