कानपुर के 35 साल पुराने मुठभेड़ मामले में बड़ा कदम, तत्कालीन थानाध्यक्ष समेत 12 पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज
कानपुर के महाराजपुर इलाके में 22 अगस्त 1991 को पुलिस ने मुठभेड़ के दौरान 12 लोगों को अरेस्ट करने का दावा किया था। उनके पास से हथियार बरामदगी दिखाई गई थी। ये मुठभेड़ फर्जी निकली है।

कानपुर,उत्तर प्रदेश। के कानपुर में वर्ष 1991 के कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ मामले में करीब 35 साल बाद कार्रवाई हुई है। अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) की जांच के आधार पर तत्कालीन महाराजपुर थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी समेत 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। आरोप है कि उस समय पुलिस ने मुठभेड़, गिरफ्तारी और हथियारों की बरामदगी से संबंधित मनगढ़ंत कहानी तैयार कर निर्दोष लोगों को झूठे मामलों में फंसाया था। मामले में सीआईडी ने गवाहों के बयान, दस्तावेजों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की जांच के बाद कार्रवाई की है।
यह मामला महाराजपुर थाना क्षेत्र में अगस्त 1991 में हुई कथित मुठभेड़ से जुड़ा है। शिकायतकर्ता चकेरी के गांधीग्राम निवासी देव प्रसाद पाठक ने शासन से शिकायत की थी कि मुफ्त में प्लॉट देने से इनकार करने पर तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी ने उनके छोटे भाई राकेश पाठक समेत कई लोगों को झूठे मुकदमों में फंसा दिया। शिकायत के बाद मामले की जांच सीआईडी की अपराध शाखा को सौंपी गई थी।
जांच के दौरान डीसीएम चालक उमाशंकर पासी और क्लीनर बुजेंद्र सिंह के बयान महत्वपूर्ण बताए गए। दोनों के मुताबिक, 22 अगस्त 1991 को वे डीसीएम में साबुन लादकर कानपुर से वाराणसी जा रहे थे। रामादेवी चौराहे के पास एक पुलिसकर्मी उनके वाहन में सवार हुआ। इसके बाद कुछ अन्य लोगों को भी डीसीएम में बैठाया गया और वाहन को महाराजपुर थाने ले जाया गया। गवाहों का आरोप है कि वाहन में मौजूद पांच लोगों में से दो किसी तरह भाग निकले, जबकि तीन को पुलिस ने पकड़ लिया। बाद में उनसे कुछ कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए, लेकिन उन्हें यह नहीं बताया गया कि उन दस्तावेजों में क्या लिखा था।
शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों ने आरोप लगाया कि राकेश पाठक, दिनेश कुमार, शिवकुमार और जगदीश द्विवेदी को पुलिसकर्मी उनके घरों से उस समय उठा ले गए, जब वे सो रहे थे। यह भी आरोप लगाया गया कि राकेश पाठक के पिता की लाइसेंसी दोनाली बंदूक और देव प्रसाद पाठक की लाइसेंसी राइफल पुलिस अपने साथ ले गई थी। बाद में इन्हीं हथियारों को पुलिस कार्रवाई के दौरान बरामद दिखाए जाने का आरोप है। सीआईडी ने इन दावों की जांच के लिए मौखिक बयानों के साथ दस्तावेजी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का भी परीक्षण किया।
मामले में दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, पुलिस ने उस समय दावा किया था कि मुखबिर से सूचना मिली थी कि नर्वल मोड़ के पास जीटी रोड पर कुछ बदमाश वाहनों को रोककर लूटपाट की योजना बना रहे हैं। पुलिस के मुताबिक, 23 अगस्त की रात करीब 12:30 बजे कुछ लोगों ने सड़क पर बबूल की डालियां डालकर ट्रक और डीसीएम रोकने का प्रयास किया, जिसके बाद कथित मुठभेड़ हुई। पुलिस ने इस कार्रवाई में राकेश पाठक समेत 12 लोगों को गिरफ्तार करने और उनके कब्जे से हथियार तथा बम बरामद करने का दावा किया था। इसी आधार पर महाराजपुर थाने में दो अलग-अलग मुकदमे दर्ज किए गए थे।
सीआईडी की जांच में पुलिस की ओर से पेश किए गए घटनाक्रम और बरामदगी के दावों पर सवाल उठाए गए। जांच के आधार पर संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ झूठे साक्ष्य गढ़ने, लोकसेवक को गलत सूचना देने, गलत अभिलेख तैयार करने, अवैध रूप से हिरासत में रखने और चोट पहुंचाने समेत आठ धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।
इस मामले में पहले कुल 18 पुलिसकर्मियों को नामजद किया गया था। इनमें तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी, उपनिरीक्षक दुर्दिन सिंह और उपनिरीक्षक रमाकांत समेत अन्य पुलिसकर्मी शामिल थे। इनमें से छह पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो चुकी है। अब शेष 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। इनमें सेवानिवृत्त उपनिरीक्षक, हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल भी शामिल हैं।
करीब साढ़े तीन दशक पुराने इस मामले में कार्रवाई के बाद अब जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण पर नजर रहेगी। आरोपों की अंतिम पुष्टि अदालत में साक्ष्यों और सुनवाई के आधार पर होगी।




