दृष्टिहीन पति, घिसटती पत्नी और बेपरवाह सिस्टम
बुरहानपुर में 35 किमी का दर्दनाक सफर तय कर जनसुनवाई में पहुंचे दिव्यांग दंपती

इंदौर/मध्य प्रदेश। सरकार भले ही गरीबों और दिव्यांगों के पुनर्वास के लिए दर्जनों योजनाओं का दावा करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत दूरस्थ आदिवासी अंचलों में इन दावों की पोल खोल रही है। हालात ऐसे हैं कि जर्जर व्यवस्था की मार झेलते-झेलते अब जरूरतमंदों की आंखों में आंसू तक नहीं बचे। मंगलवार को बुरहानपुर कलेक्टर कार्यालय में आयोजित जनसुनवाई में खकनार विकासखंड के बाकड़ी गांव से पहुंचे दिव्यांग दंपती तेलू डावर और शाजा बाई ने सिस्टम की संवेदनहीनता की तस्वीर सामने रख दी। भीख मांगकर चार बच्चों का पेट पालने वाला तेलू जन्म से दृष्टिहीन है, जबकि उसकी पत्नी शाजा बाई दोनों पैरों से दिव्यांग होकर घिसट-घिसट कर चलने को मजबूर है।
कई कोशिशों के बाद शाजा बाई को तो दिव्यांगता पेंशन मिल गई, लेकिन तेलू सालों से पेंशन के लिए दर-दर भटक रहा है। पंचायत सचिव की लापरवाही ने हालात और बिगाड़ दिए। इसी कारण शाजा बाई मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी लाड़ली बहना योजना का लाभ भी नहीं पा सकी। हैरानी की बात यह है कि पंचायत से लेकर सामाजिक न्याय विभाग तक, किसी ने भी इस आदिवासी दिव्यांग दंपती के पुनर्वास की सुध नहीं ली। दर्द यहीं खत्म नहीं होता। दंपती के दो बेटे और दो बेटियां आज भी शिक्षा से कोसों दूर हैं, मानो गरीबी और दिव्यांगता ने उनका भविष्य पहले ही तय कर दिया हो।
आदिवासी बहुल बाकड़ी गांव नेपानगर क्षेत्र के जंगलों से सटा हुआ, जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित है। जनसुनवाई तक पहुंचने के लिए दंपती को पहले बस से नेपानगर, फिर शहर और अंत में कलेक्ट्रेट तक का लंबा सफर तय करना पड़ा। सामान्य व्यक्ति के लिए यह सफर शायद मामूली हो, लेकिन जब पति आंखों से देख नहीं सकता और पत्नी चल भी नहीं पाती, तो इस संघर्ष की पीड़ा शब्दों में बयान करना मुश्किल है। उन्होंने यह कष्ट सिर्फ इस उम्मीद में सहा कि शायद कोई जिम्मेदार अधिकारी उनकी आवाज सुन ले और हर माह मिलने वाली 600 रुपये की पेंशन का सहारा मिल जाए, जिससे जीवन की थोड़ी सी तकलीफ कम हो सके।




