बिहार के वन देवी मंदिर का रहस्य, जहां सूर्यास्त के बाद प्रवेश परंपरागत रूप से वर्जित; फिल्म ‘द वीवान’ से फिर चर्चा में आया मंदिर

बिहार के बिहटा में स्थित प्राचीन मां वन देवी मंदिर अपनी रहस्यमयी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है, जिस पर बॉलीवुड फिल्म द वीवान भी आधारित है। विंध्याचल की मां विंध्यवासिनी से जुड़े इस धाम में मूर्ति की नहीं बल्कि पवित्र पिंड की पूजा होती है। यहां सूर्यास्त के बाद मंदिर परिसर में किसी का भी प्रवेश पूरी तरह वर्जित है।

पटना,एजेंसी। बिहार की राजधानी पटना से करीब 35 किलोमीटर दूर बिहटा क्षेत्र में स्थित मां वन देवी मंदिर अपनी प्राचीन लोक मान्यताओं, धार्मिक आस्था और अनूठी परंपराओं के लिए जाना जाता है। जंगल के बीच स्थित इस मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों के बीच कई कथाएं प्रचलित हैं। सूर्यास्त के बाद मंदिर और आसपास के जंगल में प्रवेश की मनाही इसकी रहस्यमयी पहचान को और गहरा करती है। अब बॉलीवुड अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया अभिनीत फिल्म ‘द वीवान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ के कारण भी यह मंदिर चर्चा में है। बताया जा रहा है कि फिल्म की कहानी वन देवी मंदिर से जुड़ी लोक मान्यताओं से प्रेरित है।
बिहटा के पास अमहारा, राघोपुर और कंचनपुर गांवों के संगम क्षेत्र में स्थित यह मंदिर बिहार के कम चर्चित धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदिर का इतिहास कई सदियों पुराना है और इसकी स्थापना से जुड़ी कहानी मां विंध्यवासिनी की भक्ति से संबंधित है। मंदिर की वास्तविक प्राचीनता के बारे में स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं, जबकि स्थानीय परंपराओं में इसे लगभग 350 से 400 वर्ष पुराना बताया जाता है।
लोककथाओं के मुताबिक, राघोपुर निवासी विद्यानंद मिश्रा मां विंध्यवासिनी के अनन्य भक्त थे और दर्शन-पूजन के लिए विंध्याचल जाया करते थे। उम्र बढ़ने के साथ उनके लिए लंबी यात्रा करना कठिन हो गया। मान्यता है कि एक दिन मां वन देवी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और पवित्र पिंड का एक अंश अपने निवास स्थान पर ले जाकर स्थापित करने का निर्देश दिया। इसके बाद विद्यानंद मिश्रा पवित्र पिंड को अपने गांव लाए और जंगल में उसकी स्थापना की। कहा जाता है कि शुरुआती दौर में वहां कोई भव्य मंदिर नहीं था, बल्कि एक साधारण झोपड़ी में पिंड स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती थी। जंगल के बीच देवी की स्थापना होने के कारण यह स्थान आगे चलकर वन देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
मंदिर के विकास को लेकर भी स्थानीय लोगों के बीच परंपरागत विवरण प्रचलित हैं। बताया जाता है कि वर्ष 1958 के आसपास संत भगवान दास त्यागी यज्ञ के आयोजन के लिए अमहारा आए थे। स्थानीय मान्यता के अनुसार, पवित्र पिंड के आसपास मौजूद साधारण संरचना को व्यवस्थित मंदिर का रूप देने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसके बाद 12 फरवरी 1997 को स्थानीय श्रद्धालुओं ने मंदिर के सामने के हिस्से का निर्माण कराया। यहां देवी की पारंपरिक मूर्ति के बजाय पवित्र पिंड की पूजा की जाती है, जो इस मंदिर की विशिष्ट धार्मिक पहचान मानी जाती है।
वन देवी मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित परंपरा सूर्यास्त के बाद प्रवेश पर रोक है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, शाम ढलने के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और श्रद्धालुओं को वहां रुकने की अनुमति नहीं होती। लोककथाओं में कहा जाता है कि रात के समय वन देवी जंगल में विचरण करती हैं। हालांकि, किसी अलौकिक घटना या शक्ति के प्रकट होने के दावों की पुष्टि करने वाला प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा मंदिर के प्रति लोगों की जिज्ञासा और आस्था का प्रमुख कारण बनी हुई है।
फिल्म ‘द वीवान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ से इस मंदिर का नाम व्यापक स्तर पर सामने आने की उम्मीद है। जंगल, आस्था और रहस्य से जुड़ी लोककथाएं भारतीय सिनेमा में लंबे समय से आकर्षण का विषय रही हैं। वन देवी मंदिर की कहानी भी इसी सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि से जुड़ी है। हालांकि, फिल्म की कहानी और मंदिर से संबंधित वास्तविक ऐतिहासिक तथ्यों के बीच अंतर को समझना जरूरी है। मंदिर से जुड़ी कई बातें स्थानीय मान्यताओं और मौखिक परंपराओं पर आधारित हैं, जिन्हें प्रमाणित इतिहास के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
धार्मिक आस्था के साथ-साथ यह मंदिर बिहार की स्थानीय लोक संस्कृति और परंपराओं का भी हिस्सा है। यहां पहुंचने के लिए पटना से सड़क मार्ग का इस्तेमाल किया जा सकता है। बिहटा रेलवे स्टेशन निकटतम रेल संपर्क के प्रमुख विकल्पों में शामिल है, जहां से ऑटो या टैक्सी के जरिए मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। पटना का जय प्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी यहां आने वाले यात्रियों के लिए एक विकल्प है। पटना से मंदिर की दूरी सड़क मार्ग के अनुसार लगभग 35 किलोमीटर बताई जाती है।
वन देवी मंदिर की पहचान केवल उससे जुड़ी रहस्यमयी कहानियों तक सीमित नहीं है। यह स्थान स्थानीय श्रद्धालुओं की आस्था, पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं और बिहार की लोक संस्कृति का प्रतीक भी है। फिल्म के जरिए इस मंदिर की चर्चा बढ़ने के बीच इसकी मान्यताओं को सम्मान देने के साथ-साथ ऐतिहासिक तथ्यों और लोककथाओं के बीच अंतर बनाए रखना भी आवश्यक है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button